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धर्म मन के लिए आवश्यक है, लेकिन सत्य के लिए बाधा। आध्यात्मिकता मन को गिराती है, इसलिए वह डरावनी है। धर्म आशा देता है, आध्यात्मिकता मौन। धर्म स्वप्न दे

अध्याय : धर्म — मन का आधार, सत्य का आवरण

मन अपने आप खड़ा नहीं रह सकता।
उसे किसी सहारे की आवश्यकता है —
जैसे शरीर को भोजन,
वैसे मन को आशा।
धर्म वही आशा है।

1. विज्ञान और धर्म की सीमा

विज्ञान शरीर की सुविधा का शास्त्र है।
वह रोग से बचाता है,
दुख कम करता है,
जीवन को लंबा और आरामदेह बनाता है।
धर्म मन की सुविधा का शास्त्र है।
वह भय से बचाता है,
असहायता ढँकता है,
पीड़ा को सहने लायक बनाता है।
विज्ञान शरीर को चलाए रखता है,
धर्म मन को।

2. धर्म : मन का स्तम्भ

मन निरंतर असुरक्षित है।
मृत्यु का भय,
असफलता का डर,
अर्थहीनता की पीड़ा।
धर्म कहता है —
डरो मत, भगवान है।
सब ठीक हो जाएगा।
स्वर्ग मिलेगा।
अगला जन्म बेहतर होगा।
ये कथन सत्य के नहीं,
मन के संरक्षण के लिए हैं।
अगर धर्म गिर जाए,
तो मन बेहोश हो जाएगा।
मन विकृत हो जाएगा।
मन टूट जाएगा।
इसलिए धर्म मन का आधार है।

3. धर्म का असली कार्य

धर्म मुक्ति की ओर नहीं ले जाता।
धर्म आनंद की ओर नहीं ले जाता।
धर्म शांति की ओर नहीं ले जाता।
धर्म केवल यह करता है —
संघर्ष बनाए रखता है
भीतर झूठी हिम्मत पैदा करता है
जीवन को किसी तरह खींचता है
धर्म मन को जीवित रखता है,
सत्य को नहीं।

4. स्वप्न, आशा और ईश्वर

धर्म स्वप्न देता है।
आशा देता है।
भविष्य का लालच देता है।
मन इन पर ही खड़ा है।
भगवान मिलेंगे —
यह वाक्य मन का संबल है।
ईश्वर दर्शन होगा —
यह मन की तसल्ली है।
स्वर्ग मिलेगा —
यह मन का इनाम है।
ये सब मन को बहलाने की भाषा है।

5. जो आनंद में खड़ा है

जो व्यक्ति — आनंद में खड़ा है,
शांति में खड़ा है,
प्रेम में खड़ा है —
वह पूर्ण है।
उसके लिए —
धर्म संस्था है
गुरु व्यापार है
शास्त्र स्मृति हैं
वहाँ कोई साधना नहीं,
कोई कृपा नहीं,
कोई सौदा नहीं।

6. आध्यात्मिक क्या है

आध्यात्मिक कोई मार्ग नहीं।
कोई विधि नहीं।
कोई वादा नहीं।
जैसे — नदी बहती है,
वृक्ष खड़ा है,
पक्षी गाता है।
न कोई लक्ष्य,
न कोई पुरस्कार।
बस होना।

7. सत्य : मन का शत्रु

जो मन को सहारा देता है —
वह धर्म है।
जो मन को तोड़ देता है —
वह सत्य है।
इसलिए — सत्य मन का शत्रु है।
आध्यात्मिकता मन की शत्रु है।
मन को वही पसंद है — जो उसे बचाए,
जो उसे सम्मान दे,
जो उसे श्रेष्ठ बनाए।

8. अहंकार और धर्म

धर्म को सम्मान इसलिए मिलता है
क्योंकि वह अहंकार को पालता है।
मैं धार्मिक हूँ।
मैं आस्तिक हूँ।
मैं सही हूँ।
अहंकार धर्म को खाता है,
धर्म अहंकार को।
दोनों एक ही खेल के दो पात्र हैं।

9. अंतिम कथन

धर्म मन के लिए आवश्यक है,
लेकिन सत्य के लिए बाधा।
आध्यात्मिकता मन को गिराती है,
इसलिए वह डरावनी है।
धर्म आशा देता है,
आध्यात्मिकता मौन।
धर्म स्वप्न देता है,
आध्यात्मिकता जागरण।

🆅🅴🅳🅰🅽🆃🅰 2.0 🅰 🅽🅴🆆 🅻🅸🅶🅷🆃 🅵🅾🆁 🆃🅷🅴 🅷🆄🅼🅰🅽 🆂🅿🅸🆁🅸🆃 वेदान्त २.० — मानव आत्मा के लिए एक नई दीप्ति — अज्ञात अज्ञानी

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