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उत्तराखंड चमोली जनपद । एशिया की सबसे लंबी धार्मिक पदयात्रा 5 सितंबर, 2026 से होगी। मां नंदा देवी ने जताई कैलाश जाने की इच्छा।

विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्रा नंदा देवी राजजात 5 सितंबर को नंदा अपने सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर से कैलाश के लिए विदा होगी। मां नंदा ने अपने मुख्य अवतारी पुरुष पर अवतरित होकर इसी वर्ष कैलाश जाने की इच्छा जताई।

महापंचायत ने 23 जनवरी को वसंत पंचमी पर्व पर कुरुड़ में मां नंदा के सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर में बड़ी जात के शुभारंभ का मुहुर्त निकालने का निर्णय लिया गया था। जिसके अनुसार वसंत पंचमी पर्व पर शुक्रवार को मां नंदा के सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर परिसर में नंदा की बड़ी जात का दिनपट्टा कार्यक्रम प्रस्तावित किया गया था। मां नंदा ने अपने मुख्य अवतारी पुरुष पर अवतरित होककर इसी वर्ष कैलाश जाने की इच्छा जताई। इसके बाद गौड़ ब्राह्मणों ने बड़ी जात आयोजन का दिनपट्टा तय किया। इसी के साथ मां नंदा की बड़ी जात की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं।

नंदा की लोकजात प्रतिवर्ष आयोजित होती है, जबकि पंरपरा और आदिकाल से चली आ रही जात (यात्रा) को राजजात के नाम से जाना जाता है। सिद्धपीठ कुरुड़ और नंदा राजजात समिति में एकराय न बनने के बाद इस बार नंदा की राजजात को बड़ी जात का नाम दे दिया गया है। बड़ी जात का नेतृत्व कुरुड़ मंदिर समिति कर रही है।


हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाली विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्रा नंदा देवी राजजात करीब 280 किलोमीटर लंबी यात्रा लगभग 20 दिनों तक चलती है, जिसे हिमालयी महाकुंभ के नाम से भी जाना जाता है। जिसकी अगुवाई चौसिंगा यानी चार सींग वाला खाडू करता है। मान्यता है कि खाडू के जन्म के साथ ही राजजात का समय तय हो जाता है। इसे मां नंदा का प्रतिनिधि माना जाता है। यह यात्रा चमोली के नौटी गांव से शुरू होकर होमकुंड तक जाती है। जो कि हिमालय की सबसे कठिन और पैदल यात्रा मानी जाती है।



मां नंदा की ससुराल वापसी की पौराणिक कथा ***
नंदा देवी को भगवान शिव की पत्नी माना जाता है और कैलास को उनका ससुराल। मान्यता है कि एक बार देवी नंदा मायके आईं और 12 साल तक नहीं लौटीं। इसके बाद उन्हें विशेष विधि-विधान से ससुराल विदा किया गया। यह यात्रा उसी प्रतीकात्मक विदाई की स्मृति है, जो गढ़वाल और कुमाऊं के लोगों में रची-बसी है।

7वीं सदी में हुई थी परंपरा की शुरुआत

गढ़वाल नरेश शालिपाल ने 7वीं सदी में इस परंपरा की नींव रखी थी। राजा कनकपाल ने इस यात्रा को और भी भव्य स्वरूप प्रदान किया। यात्रा को सम्पन्न कराने में गढ़वाल राजवंश, नौटी गांव के राजगुरु, ब्राह्मण और सयाने सामूहिक भूमिका निभाते हैं। यह परंपरा आज भी श्रद्धा से निभाई जाती है।

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