
शहरी खींचतान में कुचली गई ग्रामीण प्रतिभा , कुछ सालों से जिला मुख्यालय पर पत्रकार हो रहे है नजरअंदाज
✍️ माल का खेड़ा......सोराज सिंह चौहान
कभी 26 जनवरी और 15 अगस्त जिला मुख्यालय पर पत्रकारिता के सम्मान के ऐसे अवसर होते थे, जहाँ शहर और गाँव का भेद मिट जाता था। रिपोर्टिंग का क्षेत्र, जोखिम और योगदान ही पहचान होता था। लेकिन आज वही मंच शहरी खींचतान और संगठनात्मक अहंकार का अखाड़ा बन चुका है—और इसकी सबसे बड़ी कीमत ग्रामीण प्रतिभाशाली पत्रकारों ने चुकाई है।पिछले कुछ वर्षों का सच बेहद कड़वा है। शहर के कुछ कथित पत्रकारिता-नेताओं ने सम्मान को अपनी-अपनी गुटीय सूची में बदल दिया। कोई “बड़ा संगठन” होने का दावा लेकर प्रशासन के सामने खड़ा हुआ, तो दूसरा “छोटे संगठन” को नीचा दिखाने में लग गया। पत्रकारिता का विमर्श काम और सरोकार से हटकर केवल इस बहस में सिमट गया कि किसका संगठन बड़ा है और किसका छोटा।इस पूरी शहरी खींचतान में ग्रामीण अंचल के सैकड़ों नहीं, हज़ारों प्रतिभाशाली पत्रकार मुँह देखते रह गए।वे पत्रकार, जो दूर-दराज़ के इलाकों में प्रशासनिक लापरवाही, अवैध गतिविधियों, सामाजिक अन्याय और जनसमस्याओं को उजागर करते रहे—उन्हें न सूची में जगह मिली, न मंच पर नाम, और न ही वह सम्मान जो उनके श्रम का हक़ था।यह केवल उपेक्षा नहीं, संस्थागत अन्याय है।सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि जिन पत्रकारिता संगठनों का दायित्व था सभी की आवाज़ बनना, वे स्वयं सत्ता-प्रदर्शन में उलझ गए। प्रशासन के सामने पत्रकारों के मुद्दे रखने के बजाय यह साबित करने में ऊर्जा खर्च हुई कि “मेरा संगठन बड़ा है, उसका छोटा”।इस शक्ति-प्रदर्शन की लड़ाई में पत्रकारिता का आत्मसम्मान और ग्रामीण अंचल की पहचान दोनों कुचल दी गईं।
यह प्रश्न अब अनदेखा नहीं किया जा सकता—क्या प्रशासन के लिए केवल शहरी पते वाले पत्रकार ही गंभीर हैं?
क्या ग्रामीण पत्रकारिता को सिर्फ खबरें भेजने का साधन समझ लिया गया है, सम्मान का हकदार नहीं?प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। यदि सम्मान की सूची गुटीय दावों के आधार पर तय होगी, तो निष्पक्षता कैसे बचेगी? क्या प्रशासन यह भूल गया कि पत्रकारिता संगठन नहीं, व्यक्ति के कर्म से जानी जाती है?आज ज़रूरत है स्पष्ट निर्णय की—शहरी गुटबाज़ी से ऊपर उठकर ग्रामीण पत्रकारिता को मान्यता देने की।सम्मान के मापदंड तय करने की, ताकि कोई प्रतिभाशाली पत्रकार केवल इसलिए पीछे न रह जाए क्योंकि वह किसी “बड़े” संगठन का हिस्सा नहीं है या शहर में नहीं रहता।यदि अब भी यही हाल रहा, तो 26 जनवरी और 15 अगस्त के सम्मान लोकतंत्र को मज़बूत करने के बजाय ग्रामीण पत्रकारों को यह संदेश देंगे कि उनकी मेहनत की कोई कीमत नहीं।
और यह संदेश पत्रकारिता के लिए नहीं, लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा ।