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जिसके पास जीवन है— उसके पास सब कुछ है। जिसके पास जीवन नहीं— उसके पास सुख भी है, दुःख भी है, पर कुछ भी वास्तविक नहीं। जीवन मिलता नहीं— जीवन जिया जाता

1-जीवन में कुछ भी नहीं मिलता****

जीवन में कुछ भी नहीं मिलता।
न प्रारम्भ में मिला था,
न अंत में मिलेगा।
जहाँ से आये थे—शून्य (0),
जहाँ लौटेंगे—शून्य (0)।
जो बीच में दिखाई देता है—
सुख, दुःख, उपलब्धि, हानि—
वे जीवन नहीं,
वे संस्कार और परिस्थितियाँ हैं।

2-सुख–दुःख : संसार की परिभाषा******

जहाँ सुख और दुःख साथ-साथ बढ़ते हैं,
वही संसार है।
कितना भी पा लो—
दोनों साथ बढ़ेंगे।
यही संसार-सागर है,
यही माया है,
यही जन्म-मृत्यु-लोक है,
यही नर्क है।
इस संसार में
सुख कभी संभव नहीं।
यह असंभव है—
यह नियम है।

3-जीवन क्या है?****

जीवन आगे नहीं है।
जीवन बाद में नहीं है।
जीवन यहीं और अभी है।
और जीवन का स्वरूप है—
आनंद, शांति, प्रेम, संतुष्टि।
यही संत का जीवन है,
यही संन्यासी का जीवन है,
यही वास्तविक धार्मिक-आध्यात्मिक उपलब्धि है।

4-* संसार में जीना और जीवन जीना*****

संसारी मनुष्य
कभी-कभार
त्योहार, उत्सव, होली-दिवाली में
क्षणिक आनंद अनुभव करता है।
बाक़ी दिन—
सुख-दुःख का झूला।
पर जिसने जीवन को जीना सीख लिया,
उसके लिए—
हर रात दिवाली है,
हर दिन होली है।
और उसके लिए
कभी-कभार ही
दुःख आता है।

*5-*भीड़ : सबसे बड़ा धोखा*****

जहाँ भीड़ है,
वहाँ जीवन नहीं।
भीड़ दुःख भी है,
भीड़ नर्क भी है।
शांति, प्रेम और आनंद
भीड़ में असंभव हैं।
जो भीड़ में बैठकर
गुरु बना है—
वह महाठग है।
जीवन अकेले जीया जाता है।

*6*-अर्थ जीवन का अंग है, जीवन नहीं****

धन, साधन, सुविधा—
जीवन के अंग हैं,
पर जीवन नहीं।
जो इन्हें सुख समझे—
वह माया में है।
जो इन्हें जीवन समझे—
वह भी माया में है।
ज़रूरत तक—
ये सहायक हैं।
ज़रूरत से अधिक—
ये दुःख को जन्म देते हैं।

7*-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का भ्रम****

यह कहना कि—
पहले अर्थ,
फिर काम,
फिर धर्म,
फिर मोक्ष—
यह जीवन के विरुद्ध है।
जीवन क्रम से नहीं मिलता।
जीवन समझ से मिलता है।

8-कोई सुखी नहीं है****

कोई भी सच में सुखी नहीं है।
सुख-दुःख केवल तुलना से दिखते हैं।
तुलना हटते ही
सुख-दुःख दोनों गिर जाते हैं।
पर आनंद, शांति और प्रेम
तुलना से पैदा नहीं होते—
वे अवस्था हैं।

9-यह ज्ञान सबके लिए नहीं****

यह ज्ञान
सभी के लिए नहीं है।
जो समझ सकता है—
उसके लिए यह वरदान है।
जो भीड़ में खड़ा है,
जो अज्ञान में है,
जो भीड़ को सत्य मानता है—
उसके लिए यह लेख
गलत लगेगा,
खतरनाक लगेगा,
अस्वीकार्य लगेगा।
और यह ठीक है।
क्योंकि
जिसके पास देखने की आँख नहीं,
उसके लिए
सत्य को सिद्ध करना भी
असंभव है।

अंतिम सत्य***

जिसके पास जीवन है—
उसके पास सब कुछ है।
जिसके पास जीवन नहीं—
उसके पास
सुख भी है,
दुःख भी है,
पर कुछ भी वास्तविक नहीं।
जीवन मिलता नहीं—
जीवन जिया जाता है।

ᐯEᗪᗩᑎTᗩ 2.0 ᗩ ᑎEᗯ ᒪIGᕼT ᖴOᖇ TᕼE ᕼᑌᗰᗩᑎ ᔕᑭIᖇIT वेदान्त २.० — मानव आत्मा के लिए एक नई दीप्ति — अज्ञात अज्ञानी

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