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झूठे केस करने वालों का अब खैर नहीं.. इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्देश..

यदि जाँच में यह पाया जाता है कि एफ.आई.आर. या एन.सी.आर. पूरी तरह झूठी है और जैसा आरोप लगाया गया था वैसी कोई घटना हुई ही नहीं, तो विवेचना अधिकारी का कर्तव्य केवल अंतिम रिपोर्ट/क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल करना ही नहीं है। बल्कि उसे झूठी सूचना देने वाले सूचना-दाता (Informant) और गवाहों के विरुद्ध लिखित शिकायत भी दाखिल करनी होगी, जैसा कि धारा 215(1)(a) बी.एन.एस.एस. (पहले धारा 195(1)(a) दण्ड प्रक्रिया संहिता) में अनिवार्य रूप से प्रावधान है, ताकि धारा 212 और 217 बी.एन.एस. (पहले धारा 177 और 182 भारतीय दण्ड संहिता) के अंतर्गत कार्यवाही हो सके।
ऐसी लिखित शिकायत के बिना दी गई अंतिम रिपोर्ट को मजिस्ट्रेट द्वारा स्वीकार नहीं की जाएगी।
यदि जाँच अधिकारी, थाना प्रभारी (SHO), क्षेत्राधिकारी (CO) या अभियोजन अधिकारी (Prosecuting Officer) इस कर्तव्य का पालन नहीं करते हैं, तो यह उनके कर्तव्यों की घोर उपेक्षा (dereliction of duty) मानी जाएगी, जिसके परिणामस्वरूप उनके विरुद्ध विभागीय कार्यवाही, अवमानना (Contempt of Court) की कार्यवाही हो सकती है तथा यह धारा 199(b) बी.एन.एस. (पहले धारा 166A(b) आईपीसी) के अंतर्गत अपराध भी बन सकता है।
यदि जाँच प्रक्रिया दोषपूर्ण या अपूर्ण पाई जाती है, तो मजिस्ट्रेट को आगे की जाँच (Further Investigation) का आदेश देने का अधिकार है।
बी.एन.एस.एस. के अंतर्गत यह भी अनिवार्य है कि सूचना-दाता को 90 दिनों के भीतर जाँच की प्रगति और पुलिस रिपोर्ट दाखिल किए जाने की सूचना दी जाए, ताकि वह समय रहते विरोध-प्रार्थना पत्र (Protest Petition) दाखिल कर सके।
इन निर्देशों का पालन न किए जाने पर अवमानना की कार्यवाही की जा सकती है। यदि इस न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियों का अक्षरशः और पूर्ण रूप से पालन नहीं किया गया, तो पीड़ित व्यक्ति पुलिस अधिकारियों तथा न्यायिक अधिकारियों के ऐसे अवमाननापूर्ण आचरण के विरुद्ध उचित कार्रवाई हेतु इस न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।

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