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बसंत पंचमी: आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व

सर्वप्रथम बसंत पंचमी एवं माँ सरस्वती पूजन के इस पावन अवसर पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ!
आज बसंत आपके जीवन में ज्ञान, उल्लास, सृजनशीलता और समृद्धि लेकर आए।
हिंदू धर्म के अधिकांश पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं होते, बल्कि उनमें गहन आध्यात्मिक, प्राकृतिक और वैज्ञानिक संदेश छिपे होते हैं। हमारे प्राचीन ऋषि-मनीषियों ने इन पर्वों की रचना इतनी सूक्ष्म बुद्धिमत्ता से की कि वे मानव जीवन को प्रकृति के साथ सामंजस्य में बाँधने का सशक्त माध्यम बन गए। बसंत पंचमी भी ऐसा ही एक अनुपम पर्व है, जिसमें आध्यात्मिकता और विज्ञान का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
*बसंत: ऋतुओं का राजा*
‘बसंत’ को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। यह पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। इस समय प्रकृति अपने पूर्ण सौंदर्य पर होती है—खेतों में फसलें लहलहाती हैं, सरसों और मटर के पीले फूल चारों ओर उल्लास बिखेरते हैं। वातावरण में मधुर मादकता छा जाती है, जिससे किसान का हृदय आनंद से भर उठता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं भगवद्गीता में कहा है—
“ऋतूनां कुसुमाकरः” अर्थात् ऋतुओं में मैं बसंत हूँ।
यह वही समय है जब प्रकृति अपने पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) को पूर्ण संतुलन में लाकर नवजीवन प्रदान करने के लिए तैयार हो जाती है।
*पीले रंग का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व*
बसंत ऋतु में चारों ओर पीला रंग बिखरा होता है। खेतों में खिलते सरसों के पीले फूल मानो कह रहे हों—
“इस पल को अपने आँचल में समेट लो, कहीं बिखर न जाए पूरवैया से।”
हिंदू परंपरा में पीला रंग अत्यंत शुभ माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं पीतांबरधारी कहलाते हैं। पीला रंग शुद्धता, सात्विकता, सादगी और ज्ञान का प्रतीक है।
वैज्ञानिक दृष्टि से पीला रंग सूर्य की किरणों को अधिक मात्रा में ग्रहण करता है, जिससे मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे एकाग्रता, मानसिक संतुलन और आत्मिक स्थिरता बढ़ती है। फेंगशुई जैसे प्राचीन विज्ञान में भी पीला रंग आत्मिक ऊर्जा और प्राण शक्ति से जुड़ा माना जाता है। इसी कारण बसंत पंचमी पर पीले वस्त्र धारण करने, पीले फूल चढ़ाने और पीले व्यंजनों (जैसे केसरिया खीर, बेसन के लड्डू) का सेवन करने की परंपरा है।
*माँ सरस्वती की उत्पत्ति: पौराणिक कथा*
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की, तो उन्हें उसमें एक शून्यता और नीरसता का अनुभव हुआ। समस्त प्राणी चेतनाहीन प्रतीत हो रहे थे। तब भगवान विष्णु ने अपने कमंडल से जल की कुछ बूँदें पृथ्वी पर छिड़कीं, जिससे एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई।
उस देवी के चार हाथों में पुस्तक, वीणा, पुष्प और माला थीं। ब्रह्माजी के आग्रह पर जब देवी ने वीणा के तार छेड़े, तो उससे सात मधुर स्वर (स, रे, ग, म, प, ध, नि) उत्पन्न हुए, जिन्हें ‘सरगम’ कहा गया। इन स्वरों से समस्त सृष्टि में चेतना और मधुरता का संचार हुआ।
यही देवी माँ सरस्वती कहलाईं। इसीलिए इस दिन उनकी पूजा कर ज्ञान, संगीत, विद्या और कला की आराधना की जाती है। इसी दिन बच्चों का अक्षरारंभ (विद्या आरंभ) भी अत्यंत शुभ माना जाता है।
रामायण काल से जुड़ा बसंत पंचमी का महत्व
बसंत पंचमी का उल्लेख रामायण से भी जुड़ा है। जब रावण द्वारा माता सीता का हरण हो गया, तब भगवान राम उन्हें खोजते हुए दंडकारण्य पहुँचे, जहाँ भीलनी शबरी निवास करती थीं। शबरी ने प्रेमवश अपने जूठे बेर भगवान राम को अर्पित किए, जिन्हें प्रभु ने प्रेमपूर्वक स्वीकार किया।
मान्यता है कि यह घटना बसंत पंचमी के दिन ही हुई थी। आज भी दंडकारण्य क्षेत्र (वर्तमान में गुजरात के डांग जिले और मध्य प्रदेश की सीमा पर) में माता शबरी का मंदिर और वह शिला खंड स्थित है, जहाँ प्रभु राम के बैठने की श्रद्धा है। प्रत्येक वर्ष बसंत पंचमी पर वहाँ विशाल मेला लगता है।
बसंत पंचमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, ज्ञान, संगीत, सृजनशीलता और जीवन के उल्लास का उत्सव है।
यह हमें सिखाता है कि जीवन में संतुलन, सौंदर्य और चेतना तभी संभव है, जब हम प्रकृति और ज्ञान के साथ सामंजस्य स्थापित करें।
बसंत पंचमी हमें बार-बार याद दिलाती है
“ज्ञान ही सच्ची समृद्धि है, और प्रकृति ही उसका मूल स्रोत है।”
आइए, इस बसंत में हम सब माँ सरस्वती की कृपा से ज्ञान के दीपक जलाएँ और जीवन को रंगीन बनाएँ।
जय माँ सरस्वती!
बसंत की हार्दिक शुभकामनाएँ!
*राजकुमार अश्क़*

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