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मेरे शहर की सामाजिक बुराई: सरकारी पब्लिक सुविधाओं में तोड़फोड़:


मेरे शहर की सामाजिक बुराई: सरकारी पब्लिक सुविधाओं में तोड़फोड़:
22 जनवरी: लहरागागा (सुरेश जवाहर वाला 90233-63132)
सामाजिक अन्याय और प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती
शहरों का कामकाज ठीक से चले, साफ़-सफ़ाई हो और आम लोगों को सुविधा मिले, इसके लिए सरकार, नगर परिषदें और अलग-अलग सामाजिक संगठन हर साल लाखों रुपये खर्च करके पब्लिक सुविधाएं देते हैं। इनमें शहर के अलग-अलग इलाकों में बने यूरिनल, साफ़-सफ़ाई के लिए कमेटियों की तरफ़ से रखे डस्टबिन, ट्रैफ़िक सुरक्षा के लिए चौराहों पर लगाए गए गोल शीशे और दूसरी ज़रूरी सुविधाएं शामिल हैं। ये सभी सुविधाएं आम लोगों की ज़िंदगी को रोज़ाना आसान बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं।
लेकिन यह बहुत दुख की बात है कि समाज के कुछ गैर-ज़िम्मेदार और शरारती तत्व इन पब्लिक-हित की सुविधाओं को निशाना बनाते हैं। पहले इनके साथ छेड़छाड़ की जाती है, फिर इन्हें धीरे-धीरे तोड़ा जाता है और आखिर में इन सुविधाओं को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाता है। कई जगहों पर कूड़ेदान उखाड़कर फेंक दिए जाते हैं, टॉयलेट के दरवाज़े, पाइप और दूसरे सामान तोड़ दिए जाते हैं, वहीं चौराहों पर लगे सेफ्टी ग्लास तोड़ दिए जाते हैं, जिससे एक्सीडेंट का खतरा बढ़ जाता है।
इन कामों का सीधा नुकसान आम लोगों को उठाना पड़ता है। कूड़ेदान टूटने पर कचरा सड़कों पर बिखर जाता है, जिससे गंदगी फैलती है और बीमारियों का खतरा बढ़ता है। टॉयलेट न होने की वजह से लोगों को खुली जगहों का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे शहर की साफ-सफाई और शालीनता पर सवाल उठते हैं। इसके साथ ही टूटे हुए ट्रैफिक ग्लास रोड सेफ्टी के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन जाते हैं।
इससे भी ज़्यादा चिंता की बात यह है कि यह सब सबके सामने होने के बावजूद समाज काफी हद तक चुप रहता है। लोग यह सब देखते हैं लेकिन रोकने या विरोध करने की हिम्मत नहीं करते। यही सामाजिक उदासीनता ऐसे गलत कामों को बढ़ावा दे रही है। जब कोई दोषियों को नहीं रोकता और उनके खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं होती, तो वे बेखौफ होकर पब्लिक प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाते रहते हैं।
पब्लिक प्रॉपर्टी किसी एक व्यक्ति या संस्था की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझी विरासत है। इसकी सुरक्षा करना हर नागरिक की नैतिक ज़िम्मेदारी है। समाज में जागरूकता की कमी और एडमिनिस्ट्रेटिव ढिलाई की वजह से ऐसी बुराइयां जड़ें जमा रही हैं। ज़रूरी है कि प्रशासन सख्त कदम उठाए, दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो और CCTV जैसे सिक्योरिटी इंतज़ाम मज़बूत किए जाएं। इसके साथ ही, समाज सेवी संस्थाओं, युवाओं और जागरूक नागरिकों को आगे आकर पब्लिक प्रॉपर्टी के बचाव के लिए कैंपेन चलाने चाहिए। जब ​​तक समाज खुद अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझेगा और एकजुट होकर गलत कामों के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएगा, तब तक शहरों को साफ़, सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने का सपना अधूरा रहेगा।

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