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भोपाल में लोकतंत्र की शवयात्रा — BHEL मैदान से निकला सत्ता-संरक्षण का नंगा सच**

✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा / भोपाल

18 जनवरी 2026 को भोपाल के BHEL दशहरा मैदान में जो हुआ, वह कोई साधारण राजनीतिक रैली नहीं थी। वह संविधान, प्रशासन, सामाजिक मर्यादा और सनातन परंपरा—चारों पर एक साथ किया गया हमला था। और इस हमले की सबसे शर्मनाक बात यह रही कि सरकार, शासन और प्रशासन—तीनों मूकदर्शक बने रहे। जिस प्रदेश में मुख्यमंत्री संविधान की शपथ लेकर सत्ता में बैठे हों, उसी प्रदेश की राजधानी में संतों को गाली दी जाती है, महापुरुषों का अपमान होता है, महिलाओं पर अभद्र टिप्पणियाँ होती हैं—और सत्ता का शीर्ष मौन साध लेता है। यह मौन साधना नहीं, मौन समर्थन कहलाता है। रैली के मंच से RD प्रजापति, दामोदर यादव और उनके जैसे अन्य वक्ताओं द्वारा जिस प्रकार की घृणित, कुंठित और अराजक भाषा का प्रयोग किया गया, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि आज की राजनीति का एक वर्ग नेतृत्व नहीं, उन्माद पैदा करना चाहता है।
और इससे भी अधिक खतरनाक दृश्य था—
👉 एक सेवारत IAS अधिकारी का उसी मंच पर बैठना।
यह सवाल अब वैचारिक नहीं, संवैधानिक अपराध का है।क्या किसी IAS को राजनीतिक मंच से विचारधारा विशेष का समर्थन करने की अनुमति है यदि हाँ—तो फिर सिविल सेवा की निष्पक्षता का ढोंग क्यों? जिस देश में पद्मभूषण से सम्मानित जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी जैसे संतों के लिए अभद्र भाषा बोली जाए, जिस प्रदेश में बागेश्वर धाम के श्री धीरेंद्र शास्त्री जैसे व्यक्ति—जो बिना भेदभाव सैकड़ों कन्याओं के विवाह कराते हैं—उन्हें अपमानित किया जाए, वहाँ यह मान लेना चाहिए कि राजनीति अब सुधार का नहीं, विध्वंस का औज़ार बन चुकी है।
आज एक नया ट्रेंड चल पड़ा है—
👉 सनातन को गाली दो, नेता बन जाओ।
👉 एक वर्ग को निशाना बनाओ, मंच और माइक मिल जाएगा।
लेकिन इतिहास चेतावनी देता है— 2018 में एक असंवेदनशील बयान ने सत्ता छीन ली थी। आज फिर वही अहंकार, वही भ्रम, वही गलतफ़हमी दोहराई जा रही है कि नफरत के सहारे सत्ता स्थायी हो जाएगी।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है—
👉 मुख्यमंत्री की चुप्पी किस बात का संकेत है?
👉 क्या यह सब उनकी जानकारी में नहीं था? या फिर उनकी सहमति से हो रहा है?
और उससे भी शर्मनाक यह कि प्रदेश में स्वयं को समाज का नेता कहने वाले अनेक चेहरे आज सत्ता की दहलीज़ पर बैठकर मूकदर्शक बने हुए हैं। इतिहास ऐसे मौन को कभी माफ़ नहीं करता। यह चेतावनी है—राजनीति अगर आग से खेलती है, तो एक दिन उसी आग में जलती है। आज अगर अराजकता को संरक्षण मिला, तो कल कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा—न समाज, न सरकार।
मध्य प्रदेश को उन्माद नहीं चाहिए। मध्य प्रदेश को गालियाँ नहीं चाहिए। मध्य प्रदेश को जवाब चाहिए। और वह जवाब अब मुख्यमंत्री को देना ही होगा।

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