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कानून की आड़ में 'आत्महत्या का खेल': न्याय या सवर्णों का नरसंहार?

✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा / भोपाल

भोपाल /सिंगरौली: क्या देश में अब किसी की जान की कीमत सिर्फ उसकी जाति से तय होगी? क्या भारतीय लोकतंत्र अब उसी 'फूट डालो और राज करो' की राह पर चल पड़ा है, जिसे कभी अंग्रेजों ने अपनाया था? मध्य प्रदेश के सिंगरौली से आई सौरभ मिश्रा की आत्महत्या की खबर सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि मौजूदा व्यवस्था के मुँह पर एक जोरदार तमाचा है।

व्यवस्था की संवेदनहीनता और सिसकता 'सवर्ण' समाज:
सौरभ मिश्रा, जिसने SC/ST एक्ट के तहत जेल जाने के डर से अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली, उस कड़वी सच्चाई का चेहरा बन गया है जिसे आज की सरकारें और राजनीति अनदेखी कर रही हैं। आरोप है कि कानून का डर दिखाकर ब्लैकमेलिंग का धंधा चलाया जा रहा है।

मुख्य बिंदु जो जनता को सोचने पर मजबूर करते हैं:
• ब्लैकमेलिंग का हथियार: क्या कोई भी कानून इतना निरंकुश होना चाहिए कि वह बेगुनाहों को मौत के गले लगाने पर मजबूर कर दे?
• फूट डालो, राज करो: ब्रिटिश काल की उस नीति का आधुनिक संस्करण आज की राजनीति में साफ़ दिखाई देता है, जहाँ वोट बैंक के लिए समाज के एक हिस्से को बलि का बकरा बनाया जा रहा है।
• खोखले नारे: 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा आज उन परिवारों के लिए एक क्रूर मजाक बनकर रह गया है, जिन्होंने अपने बेटों और भाइयों को व्यवस्था की भेंट चढ़ते देखा है।

"जब कानून न्याय देने के बजाय डराने और पैसे वसूलने का जरिया बन जाए, तो समझ लेना चाहिए कि देश अराजकता की ढलान पर है।"

अराजकता की ओर बढ़ता कदम: जिस तरह से 'सवर्ण समाज' के भीतर आक्रोश पनप रहा है, वह भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी है। अगर सरकारों ने अपनी आँखों से 'वोटों की पट्टी' नहीं हटाई, तो आने वाले समय में देश में जो सामाजिक अस्थिरता और अराजकता फैलेगी, उसकी जिम्मेदारी वर्तमान नेतृत्व की होगी।
सवाल जो जनता पूछ रही है: क्या आज की नीतियां सिर्फ "SC/ST/OBC का विकास और बाकी सबका सर्वनाश" के फॉर्मूले पर आधारित हैं? क्या किसी बुजुर्ग का बुढ़ापे का सहारा छिन जाने पर सरकारें सिर्फ तमाशबीन बनी रहेंगी?

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