
काग़ज़ नहीं थे, दर्द बहुत था: जनसुनवाई में मानवता ने जीत ली लड़ाई”
डिंडोरी — जनसुनवाई में हर मंगलवार सैकड़ों अर्ज़ियां आती हैं। कुछ कागज़ों की, कुछ शिकायतों की… लेकिन कभी-कभी कोई मामला कागज़ से निकलकर सीधे दिल को छू जाता है। ऐसा ही एक दृश्य विगत दिवस कलेक्ट्रेट सभागार में देखने को मिला, जब टूटी हुई वैशाखी के सहारे, झुर्रियों से भरे चेहरे और बुझी हुई आंखों में उम्मीद की आख़िरी लौ लिए एक 80 वर्षीय दिव्यांग वृद्ध न्याय की तलाश में कलेक्टर के समक्ष पहुंचा।
वृद्ध का नाम कोमलचंद जैन। उम्र ने शरीर को थका दिया है, पर संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ। बीते पांच महीनों से उनकी वृद्धावस्था पेंशन बंद थी। ऊपर से कुछ समय पहले ही एक पुत्र की हादसे में मौत हो चुकी थी। शासन की संबल योजना का कार्ड तो उनके पास था, लेकिन लाभ अब तक नहीं मिला। रोजमर्रा की जिंदगी में चलना-फिरना तक मुश्किल था और मन में एक छोटी-सी ख्वाहिश थी—अगर एक साइकिल मिल जाती, तो बाकी का सफर थोड़ा आसान हो जाता।
लेकिन नियति की विडंबना देखिए—इतनी पीड़ा के बाद भी उनके पास अपनी समस्याओं के समाधान के लिए कोई आवेदन तक तैयार नहीं था।
यहीं मानवता ने पत्रकारिता का हाथ थामा। जनसुनवाई में मौजूद जिले के वरिष्ठ पत्रकार पंकज शुक्ला, अनिल पटेल, शिवराम बर्मन और सुरेन्द्र सोनी वृद्ध की पीड़ा देखकर खुद को रोक नहीं पाए। उन्होंने कोमल जैन से बात की, हाल जाना और जब पूरी कहानी सामने आई तो तत्काल मदद के लिए आगे बढ़े। वरिष्ठ पत्रकार पंकज शुक्ला ने मौके पर ही वृद्ध का आवेदन तैयार किया और साथियों के साथ टोकन लेकर उन्हें जनसुनवाई तक पहुंचाया।
सभागार में जैसे ही यह मामला सामने आया, जिले की संवेदनशील कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया ने पूरे ध्यान से वृद्ध की बातें सुनीं। उनकी आंखों में झलकती बेबसी और शब्दों में छिपा दर्द शायद कागज़ से ज्यादा असरदार था। कलेक्टर ने बिना देर किए संबंधित अधिकारियों को त्वरित निराकरण के निर्देश दिए।
जांच में सामने आया कि कोमल जैन की पेंशन ई-केवाईसी नहीं होने के कारण रुकी हुई थी। कलेक्टर के निर्देश पर तत्काल ई-केवाईसी कराई गई, पेंशन स्वीकृत हुई और राशि सीधे उनके खाते में जमा कराई गई।
जनसुनवाई से बाहर निकलते समय वृद्ध कोमल जैन की आंखों में अब भी नमी थी—लेकिन इस बार वह नमी पीड़ा की नहीं, राहत और विश्वास की थी। यह सिर्फ एक पेंशन का मामला नहीं था, बल्कि उस भरोसे की जीत थी कि सिस्टम में आज भी संवेदना जिंदा है, और पत्रकारिता सिर्फ खबर लिखने का नाम नहीं, बल्कि जरूरतमंद के साथ खड़े होने का साहस भी है।