logo

इंसानियत और मानवता की पहचान


हमारे समाज की असली पहचान किसी की दौलत, रुतबा या ताकत से नहीं, बल्कि उसकी इंसानियत और मानवता से होती है। कभी-कभी किसी की एक संवेदनशील प्रतिक्रिया किसी टूटते हुए इंसान को संभाल सकती है। छोटे-छोटे क्षणों में जब हम अपने व्यवहार से किसी की गरिमा को बचाते हैं, वहीं से एक बेहतर समाज की नींव रखी जाती है।

👉इंसानियत की जीत..
कुछ देर पहले ही जिस चमचमाती काली गाड़ी में नवीन ने फ्यूल भरा था, वह थोड़ी ही दूर जाकर अचानक रुक गई। कुछ मिनटों बाद, एक मैकेनिक सामने के गैरेज से आया और गाड़ी देखने लगा। तभी गाड़ी का मालिक—एक ग़ुस्सैल और रौबदार व्यक्ति—तेज़ी से गाड़ी से उतरा और नवीन के पास आकर लगभग चीखते हुए बोला:
"तुमने क्या डाला मेरी गाड़ी में?"
"जी... डीज़ल..."
"बेवकूफ! तुमने मेरी गाड़ी का कबाड़ा कर दिया! हज़ारों का नुकसान हो गया। ये पेट्रोल इंजन है!"
नवीन इस पेट्रोल पंप पर हाल ही में काम पर लगा है। पढ़ाई में तेज़, मगर परिस्थितियों से मजबूर होकर नौकरी कर रहा है। यह सब सुनकर वह घबरा गया।

मैनेजर मिस्टर वर्मा वहीं खड़े थे, स्थिति को समझते हुए बीच में आये और बोले "साहब, माफ़ कीजिएगा, गलती से हो गया। लड़का नया है..."
उस व्यक्ति ने मैनेजर की भी बात को अनसुना कर एक भद्दी गाली दी और फिर बोला:
"तो मैं क्या करूं? जानता है कितनी महंगी गाड़ी है मेरी?"
मिस्टर वर्मा ने उन्हे बहुत समझाने की कोशिश की, लेकिन उस आदमी का गुस्सा कम ही नहीं हुआ। उसने इसी बीच नवीन को थप्पड़ जड़ दिया। नवीन की आंखों में आंसू थे। वह कुछ नहीं बोल पा रहा था, बस हाथ जोड़कर खड़ा रहा।
"मैं कुछ नहीं सुनूंगा! अपने मालिक को बुलाओ!" वह चिल्लाया।
मालिक का नाम सुनते ही सभी के चेहरे का रंग उड़ गया। पेट्रोल पंप के मालिक—कर्नल अनिरुद्ध सिंह—सख्त मिजाज के लिए मशहूर थे। शायद ही किसी ने उन्हें मुस्कुराते देखा हो।
मैनेजर ने उन्हें फोन लगाया। कुछ ही देर में कर्नल साहब की गाड़ी पंप पर आ गई। उनके आते ही सन्नाटा छा गया। वे सीधे मैनेजर के पास आए:
"क्या मामला है?"
मैनेजर वर्मा ने सारी बात विस्तार से बताई। कर्नल साहब ने एक बार नवीन की तरफ देखा और फिर उस गाड़ी मालिक के पास गए:
"कितना नुकसान हुआ?"
"लगभग पंद्रह - बीस हज़ार का!" उस व्यक्ति ने गुस्से में कहा।
"वर्मा जी, इन्हें बीस हज़ार रुपये दे दीजिए," कर्नल साहब ने कहा।
रुपये दिए ही जा रहे थे कि कर्नल साहब फिर बोले:
"पर तुम्हें भी अपना हर्जाना चुकाना पड़ेगा!"
"किस बात का हर्जाना?" उस आदमी ने चौंक कर पूछा।
"अपने नुकसान की भरपाई हमने कर दी। लेकिन उस लड़के की इज़्ज़त का क्या, जिसे तुमने सबके सामने थप्पड़ मारा और गालियाँ दीं? उसकी भरपाई कौन करेगा?"
वह व्यक्ति सकपकाया और कुछ पल खामोश रहा। फिर कर्नल साहब की तीखी नज़रें देखकर नवीन के पास गया और धीमे स्वर में बोला:
"माफ़ करना भाई... गुस्से में होश नहीं रहा।"
नवीन अब भी झुकी गर्दन के साथ खड़ा था।
कर्नल साहब ने सबकी ओर देखा और कहा:
"इस नए लड़के को ठीक से काम सिखाओ। शुरुआत में इसे सिर्फ एक तरह के फ्यूल वाले पंप पर लगाओ ताकि आगे से ऐसी गलती न हो।"
मैनेजर वर्मा ने डरते हुए पूछा, "तो क्या ये काम पर रहेगा?"
कर्नल साहब ने ठहरकर कहा, "क्यों नहीं? इसने कोई अपराध नहीं किया, बस एक भूल हुई है... और हर इंसान को अपनी भूल सुधारने का मौका मिलना चाहिए।"
नवीन काम पर लौट गया। सभी ने जाते-जाते कर्नल साहब के चेहरे को देखा—हां, हंसी नहीं थी, लेकिन एक ऐसा तेज़ था, जो किसी भी मुस्कान से ज्यादा उज्जवल लगा। वो तेज़ था—इंसानियत का।

सीख:----

गलती किसी से भी हो सकती है, पर हमारी प्रतिक्रिया उस गलती के सामने हमारा चरित्र दर्शाती है।
सज़ा देना आसान है, मगर माफ़ कर देना वहीं असली इंसानियत है।
जब तक समाज में कर्नल सिंह जैसे लोग हैं, उम्मीद जिंदा है कि मानवता अब भी जीवित है।

7
297 views