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कोटा में विरासत श्रृंखला में गूंजा सुर–ताल का जादू, कबीर और असम की शास्त्रीय परंपरा से सराबोर हुआ बादल महल

विरासत श्रृंखला में गूंजा सुर–ताल का जादू, कबीर और असम की शास्त्रीय परंपरा से सराबोर हुआ बादल महल
कोटा।
कोटा गढ़ स्थित ऐतिहासिक बादल महल के प्रांगण में विरासत श्रृंखला के तहत आयोजित सांस्कृतिक संध्या में गायन व नृत्य का अद्भुत संगम देखने को मिला। इस विशेष आयोजन ने दर्शकों को एक ओर असम की शास्त्रीय नृत्य परंपरा से रूबरू कराया तो दूसरी ओर कबीर के निर्गुण दर्शन में डुबो दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ मीनाक्षी मेघई द्वारा असम के शास्त्रीय नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति से हुआ। उन्होंने महापुरुष महादेव द्वारा रचित शुद्ध नृत्य ‘बोर रामदानी’ प्रस्तुत कर मंच पर दिव्यता बिखेर दी। नृत्य की भाव-भंगिमाओं और लयात्मकता ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
सत्यवान–सावित्री कथा ने बांधा समां
प्रस्तुति का चरम तब आया जब मीनाक्षी मेघई ने सत्यवान–सावित्री की पौराणिक कथा को नृत्य के माध्यम से जीवंत कर दिया। भाव, अभिनय और मुद्राओं के सटीक संयोजन से कथा का प्रभावशाली चित्रण हुआ, जिस पर दर्शकों ने तालियों से उत्साह जताया।
इसके पश्चात पद्मश्री प्रहलाद टिपानिया व उनके समूह ने निर्गुण भजनों की गंगा बहाई। कबीर के गूढ़ दर्शन को लोकधुनों में पिरोते हुए जब उन्होंने “जरा धीरे धीर हांक मेरे राम गाड़ीवाले”, “कहां से आया कहां जाओगे” जैसे भजन प्रस्तुत किए तो श्रोता झूम उठे। वहीं “सकल हंस में राम विराजे” और “गुरु बिना कोई काम न आवे” के माध्यम से उन्होंने जीवन की नश्वरता और गुरु महिमा का सारगर्भित संदेश दिया।

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