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आस्था, विचार और कानून: समानता के प्रश्न पर नई बहस


हाल ही में सामने आए एक मामले ने देश में कानून के समान अनुप्रयोग और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। चर्चा का केंद्र यह है कि क्या भारत में कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होता है, या फिर आस्था और विचार के आधार पर उसकी व्याख्या बदल जाती है।

एक ओर धार्मिक आस्था से जुड़े प्रतीकों और गतिविधियों को सामाजिक स्वीकार्यता और कभी-कभी प्रशासनिक सहनशीलता मिलती दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर संविधान, सामाजिक न्याय या ऐतिहासिक व्यक्तित्वों से जुड़े विचारों की सार्वजनिक अभिव्यक्ति पर त्वरित कानूनी कार्रवाई की खबरें सामने आती हैं। इससे यह धारणा बनती है कि कानून के प्रयोग में दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है।

संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है, लेकिन दोनों ही अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था और कानून के अधीन हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या अधिकारों में नहीं, बल्कि उनके चयनात्मक प्रयोग में है। यदि समान प्रकृति के मामलों में अलग-अलग प्रतिक्रिया दी जाती है, तो इससे कानून की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

नागरिक समाज का मानना है कि लोकतंत्र में आस्था और विचार—दोनों का सम्मान तभी संभव है, जब कानून बिना किसी भेदभाव के लागू हो। चयनात्मक कार्रवाई न केवल सामाजिक असंतोष को जन्म देती है, बल्कि युवाओं के बीच न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास भी बढ़ाती है।

विश्लेषकों के अनुसार, आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन और न्याय व्यवस्था एक समान कसौटी अपनाएँ। कानून का उद्देश्य किसी विचार या आस्था को दबाना नहीं, बल्कि समाज में संतुलन और समानता बनाए रखना है।
यही संवैधानिक लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी भी है।
डॉक्टर योगेश कुमार

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