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महाराष्ट्र में 50 प्रतिशत मतदान, लोकतंत्र की हालत पर सवाल

नासिक
महाराष्ट्र में करीब 50 प्रतिशत मतदान होना किसी भी तरह से संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। यह केवल एक चुनावी आंकड़ा नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक गंभीर संकेत है। जब आधी आबादी मतदान से दूर रहती है, तो यह साफ दिखाता है कि राजनीति और जनता के बीच भरोसे की खाई लगातार बढ़ रही है।

50 प्रतिशत मतदान का सीधा मतलब है कि हर दूसरा मतदाता चुनाव प्रक्रिया से बाहर रहा। ऐसे हालात में फैसले कुछ सीमित, सक्रिय और संगठित मतदाताओं द्वारा तय होते हैं। इससे चुनी गई सरकार को व्यापक जनसमर्थन और मजबूत नैतिक आधार नहीं मिल पाता। लोकतंत्र की असली ताकत भागीदारी में होती है, और जब भागीदारी घटती है तो व्यवस्था कमजोर होती है।

मतदान से दूरी की वजह आलस्य नहीं, बल्कि विश्वास का संकट है। बड़ी संख्या में लोग मानने लगे हैं कि सभी राजनीतिक दल एक जैसे हैं, वोट देने से कुछ बदलता नहीं और जनता को सिर्फ चुनाव के समय याद किया जाता है। यह सोच लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, क्योंकि इससे नागरिक व्यवस्था से खुद को अलग महसूस करने लगते हैं।
संगठित और कट्टर समूहों को बढ़त
कम मतदान का सबसे ज्यादा फायदा जातीय, धार्मिक और कट्टर संगठनों को मिलता है, जो सीमित संख्या में होने के बावजूद पूरी ताकत से मतदान करते हैं। इसके उलट मध्यमवर्ग, युवा और शांत मतदाता घर बैठे रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि राजनीति का संतुलन बिगड़ता है और समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता है।

जब सरकारें कुल मतदाताओं के केवल एक छोटे हिस्से के समर्थन से सत्ता में आती हैं, तो उन पर जनता का दबाव कम हो जाता है। संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत महसूस नहीं होती। ज्यादा मतदान सरकारों को यह याद दिलाता है कि सत्ता जनता के भरोसे पर टिकी है।

कम मतदान यह भी दिखाता है कि लोग बेहतर विकल्प की उम्मीद छोड़ते जा रहे हैं। अच्छा और बुरा चुनने की जगह यह भावना बनना कि कोई भी आ जाए, फर्क नहीं पड़ता, लोकतंत्र को अंदर से खोखला कर देती है।
महाराष्ट्र के संदर्भ में ज्यादा चिंता
महाराष्ट्र हमेशा से सामाजिक चेतना, सुधारक आंदोलनों और राजनीतिक सक्रियता का केंद्र रहा है। ऐसे राज्य में कम मतदान यह दर्शाता है कि राजनीतिक थकान और निराशा गहराती जा रही है।

यह स्थिति सिर्फ राजनीतिक दलों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। अगर जनता को फिर से मतदान से जोड़ना है, तो विश्वास बहाल करना होगा, जमीन पर काम दिखाना होगा और यह अहसास कराना होगा कि एक वोट से भी बदलाव संभव है। वरना लोकतंत्र सिर्फ कागजों में रह जाएगा और फैसले कुछ गिने-चुने लोगों तक सीमित हो जाएंगे।

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