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रतन टाटा — धर्म से ऊपर जीवन रतन टाटा ने दान स्वर्ग के लिए नहीं किया सेवा नाम के लिए नहीं की कर्म मोक्ष की आशा में नहीं किया

भारत की सबसे घटिया धार्मिकता क्या है?

दान, सेवा, प्रेम —
इस शर्त पर कि
स्वर्ग मिलेगा
मुक्ति मिलेगी
नाम होगा
पुण्य जमा होगा
यह दान नहीं, लेन-देन है।
यह सेवा नहीं, व्यापार है।
यह धर्म नहीं, डर और लालच की व्यवस्था है।

रतन टाटा — धर्म से ऊपर जीवन
रतन टाटा ने
दान स्वर्ग के लिए नहीं किया
सेवा नाम के लिए नहीं की
कर्म मोक्ष की आशा में नहीं किया
उन्होंने किसी भगवान को बीच में खड़ा नहीं किया।
उन्होंने धर्म, पंथ, पूजा, शास्त्र से अनुमति नहीं ली।

उन्होंने बस मनुष्य को देखा,
जीव को देखा,
पीड़ा को देखा —
और कर दिया।

उनका फल क्या था?
कोई पुण्य खाता नहीं।
कोई परलोक का सौदा नहीं।

फिर भी उन्हें मिला —
सुकून
आनन्द
संतुष्टि
शांति
यही एकमात्र वास्तविक फल है।

बाकी सब कल्पना है।
यही असली धर्म है
जो माँगा नहीं गया,
जो बेचा नहीं गया,
जो डर से नहीं,
जो लालच से नहीं,
जो स्वभाव से निकला —
वही धर्म है।

अमेरिकी कंपनियाँ हों
या भारतीय उद्योगपति —
जो मानवता, इंसानियत, जीव-दया से काम करते हैं,
वे धर्म नहीं करते —
वे धर्म होते हैं।

धर्म संस्थाएँ क्या करती हैं?
भगवान को बीच में खड़ा करती हैं
भय पैदा करती हैं
आश्वासन बेचती हैं
और कहती हैं: हमारे बिना कुछ नहीं मिलेगा
जबकि सत्य यह है —
जिसने भीतर से दिया,
उसने किसी से नहीं माँगा।

अंतिम सूत्र

धर्म कोई व्यवस्था नहीं।
धर्म कोई सौदा नहीं।
धर्म कोई विश्वास नहीं।
👉 धर्म स्वभाव है।
👉 धर्म शांति है।
👉 धर्म वही है जो करते समय ही फल दे दे।

बाकी सब —
नाम, स्वर्ग, मोक्ष —
मानव मन की चालाकियाँ हैं।

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1 comment  
  • Vaibhav Padmakar Kulkarni

    भावपूर्ण श्रद्धांजली