
शीर्षक: "आस्था घर के अंदर, देश सबसे ऊपर"
आज के समय में यह बहस जरूरी है कि हमारी पहली निष्ठा किसके प्रति होनी चाहिए?
कुछ लोग गर्व से कहते हैं कि उनके लिए उनकी धार्मिक संहिता (Personal Laws/Shariat) देश के कानून से ऊपर है। वे खुलेआम धर्म को संविधान से पहले रखते हैं। दूसरी ओर, कुछ लोग अपनी प्राचीन मान्यताओं को राष्ट्र का आधार बनाना चाहते हैं।
लेकिन एक जागरूक नागरिक के नाते हमें यह समझना होगा:
संविधान सर्वोपरि है: कोई भी मजहब, किताब या कानून भारत के संविधान से बड़ा नहीं हो सकता। जो धर्म को देश के ऊपर रखता है, वह लोकतंत्र की नींव कमजोर करता है।
दोहरा मापदंड नहीं: अगर हम चाहते हैं कि देश तरक्की करे, तो "मजहब पहले" वाली सोच को पीछे छोड़ना होगा। राष्ट्रप्रेम का मतलब ही यह है कि जब देश के कानून और धार्मिक मान्यताओं के बीच चुनाव करना हो, तो जीत हमेशा तिरंगे और कानून की होनी चाहिए।
समानता का अधिकार: सच्चा राष्ट्रप्रेमी वही है जो 'एक देश, एक विधान' (One Nation, One Law) में विश्वास रखे, न कि अपनी धार्मिक कट्टरता में।
जो लोग "ईश्वरीय कानून" की आड़ लेकर देश के संविधान को चुनौती देते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि देश किसी धर्म विशेष से नहीं, बल्कि बराबरी के अधिकार से चलता है।
राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम। 🚩🇮🇳
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इसमें मेने किसी एक पंथ को ब्लेम नही किया है शांति से पढ़े सब समझ मे आ जाएगा,
मेने ईश्वरिये और सारियत दोनों को मेंशन किया है..
कहने का तातपर्य ये है किसी को बुरा नही लगना चाहिए,
अगर बुरा लगता है तो क्षमा करें और कमेंट करें की क्या बुरा लिखा है,