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सोशल मीडिया : लोकतंत्र का 'डिजिटल हथियार' या नफरत की 'फैक्ट्री'?

सोशल मीडिया: लोकतंत्र का 'डिजिटल हथियार' या नफरत की नई 'फैक्ट्री'?
​आज हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ देश की सुरक्षा सीमाओं पर उतनी खतरे में नहीं है, जितनी हमारी जेबों में रखे मोबाइल फोन के भीतर है। सोशल मीडिया, जिसे कभी दुनिया को जोड़ने वाला सेतु माना गया था, आज वह भारत की विविधता और भाईचारे को भस्म करने वाला 'भस्मासुर' बनता जा रहा है।
​1. सच पर भारी पड़ता 'प्रोपेगेंडा'
​अब युद्ध मैदान में नहीं, व्हाट्सएप ग्रुपों और फेसबुक की टाइमलाइन पर लड़े जा रहे हैं। किसी पुरानी घटना का अधूरा वीडियो उठाकर उसे एक खास धर्म से जोड़ दिया जाता है और देखते ही देखते 'शेयर' का बटन दबाने वाली उंगलियां सड़कों पर पत्थर और पेट्रोल बम उठा लेती हैं। क्या हमने कभी सोचा है कि जिस खबर को हमने बिना सोचे-समझे आगे बढ़ाया, उसने किसी का घर जला दिया या किसी बेगुनाह की जान ले ली?
​2. हमारी सोच को 'हाइजैक' करता एल्गोरिदम
​हैरानी की बात यह है कि हम जो देखना चाहते हैं, हमें वही परोसा जा रहा है। अगर आपको एक खास समुदाय से नफरत है, तो आपका फोन आपको दिन भर उसी नफरत को पुख्ता करने वाले वीडियो दिखाएगा। नतीजा? हम एक ऐसी 'अंधी सुरंग' में जा रहे हैं जहाँ हमें दूसरे पक्ष की बात सुनाई ही नहीं देती। यह सोशल मीडिया नहीं, बल्कि हमारी सोच का 'डिजिटल किडनैपिंग' है।
​3. 'अभिव्यक्ति की आजादी' के नाम पर नंगा नाच
​आजादी का मतलब अराजकता नहीं होता। आज कीबोर्ड वॉरियर्स और तथाकथित 'इंफ्लुएंसर्स' व्यूज (views) और पैसों के लिए देश की अखंडता से खिलवाड़ कर रहे हैं। धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली पोस्ट डालना अब एक फैशन बन गया है। सरकार और टेक कंपनियों को अब अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जब तक इन डिजिटल दंगाइयों पर कानून का डंडा नहीं चलेगा और जब तक भड़काऊ पोस्ट डालने वाले जेल की सलाखों के पीछे नहीं होंगे, तब तक देश का माहौल नहीं सुधरेगा।
​4. सुधार की शुरुआत कहाँ से?
​कंट्रोल केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह हमारी भी है। हमें खुद से पूछना होगा—क्या हम एक ऐसे भारत का निर्माण कर रहे हैं जहाँ हमारा बच्चा मोबाइल उठाकर नफरत सीखे? अगर हम चाहते हैं कि हमारी जाति और धर्म बदनाम न हो, तो हमें उन 'गंदी मछलियों' को बेनकाब करना होगा जो धर्म की आड़ में नफरत का धंधा कर रही हैं।
​निष्कर्ष:
देश के संसाधनों को जलाना देशभक्ति नहीं है। असली देशभक्त वह है जो एक संदिग्ध मैसेज को आगे बढ़ाने के बजाय उसे 'डिलीट' करने का साहस दिखाए। याद रखिए, डिजिटल दुनिया की आग हकीकत की बस्तियां जला देती है। अब समय आ गया है कि सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने वालों की नकेल कसी जाए, वरना यह 'मास्टर कंप्यूटर' की दुनिया हमारे वास्तविक समाज को उजाड़ देगी।

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