
कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को नियमित कर्मियों के समान अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली-देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था Supreme Court of India ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले फैसले में स्पष्ट किया है कि एजेंसी के माध्यम से अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) पर नियुक्त कर्मचारी, सरकारी विभागों या निकायों में कार्यरत नियमित (पर्मानेंट) कर्मचारियों के बराबर अधिकारों का स्वतः दावा नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वालों और नियमित सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति प्रक्रिया, सेवा शर्तें और कानूनी स्थिति एक समान नहीं होती। ऐसे में केवल समान कार्य का हवाला देकर वेतन, भत्तों या अन्य सेवा लाभों में समानता की मांग करना संवैधानिक रूप से उचित नहीं है। क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने निर्णय में यह रेखांकित किया कि कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी किसी निजी एजेंसी या थर्ड पार्टी के माध्यम से नियुक्त होते हैं। उनकी नियुक्ति समय-सीमित और विशिष्ट शर्तों पर आधारित होती है। जबकि नियमित सरकारी कर्मचारी संवैधानिक और वैधानिक नियमों के तहत नियुक्त होते हैं, जिन पर सेवा नियम लागू होते हैं। अदालत ने यह भी जोड़ा कि यदि किसी विभाग में कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के साथ शोषण या भेदभाव होता है, तो उसके लिए अलग कानूनी उपाय उपलब्ध हैं, लेकिन इसे नियमित कर्मचारियों के बराबर अधिकार देने का आधार नहीं बनाया जा सकता। फैसले का व्यापक असर इस निर्णय का असर देशभर में कार्यरत लाखों कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों पर पड़ेगा, विशेषकर स्वास्थ्य विभाग नगर निकाय सरकारी उपक्रम शिक्षा और तकनीकी संस्थानों: विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सरकार और संस्थानों को स्पष्ट भर्ती नीति अपनाने की दिशा में प्रेरित करेगा, वहीं कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को अपने अधिकारों के लिए कानूनी ढांचे के भीतर लड़ाई लड़नी होगी। निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक सख़्त लेकिन स्पष्ट संदेश देता है- कॉन्ट्रैक्ट और पर्मानेंट सिस्टम अलग हैं, और दोनों के अधिकार भी अलग। समानता की मांग भावना से नहीं, बल्कि कानून और प्रक्रिया से तय होगी।