
*सनातन धर्म-ग्रंथों के प्रसिद्ध बारह संवाद जो जीवन के प्रति आपका नज़रिया बदल सकते हैं।*
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*सनातन धर्म-ग्रंथों के प्रसिद्ध बारह संवाद जो जीवन के प्रति आपका नज़रिया बदल सकते हैं।*
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*यमराज–नचिकेता संवाद: मृत्यु के द्वार पर खड़ा आत्मबोध*
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*सनातन धर्म की दार्शनिक परंपरा में कठोपनिषद का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। इसमें वर्णित यमराज और नचिकेता का संवाद केवल एक बालक और मृत्यु के देवता के बीच की कथा नहीं, बल्कि यह मानव जीवन के सबसे गहन प्रश्नों—मृत्यु, आत्मा, कर्म और मोक्ष—पर केंद्रित विश्व का प्रथम सुव्यवस्थित दार्शनिक संवाद माना जाता है। यह संवाद बताता है कि सत्य की खोज आयु, पद या सत्ता की मोहताज नहीं होती, बल्कि दृढ़ संकल्प और शुद्ध जिज्ञासा से जन्म लेती है।*
*कथा का प्रारंभ वाजश्रवस ऋषि के यज्ञ से होता है। यज्ञ में वे वृद्ध, रोगग्रस्त और निष्प्रयोज्य गायों का दान कर रहे थे। यह दृश्य बालक नचिकेता को भीतर तक उद्वेलित कर देता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण और कठोपनिषद के अनुसार, नचिकेता बार-बार पिता से पूछता है—“पिताजी, मुझे आप किसे दान देंगे?” क्रोध में आकर वाजश्रवस कह बैठते हैं—“तुझे मैं यम को देता हूँ।” यही वाक्य इस महान दार्शनिक यात्रा का बीज बन जाता है।*
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*पिता की आज्ञा को सर्वोपरि मानकर नचिकेता यमलोक की ओर प्रस्थान करता है। यहाँ सनातन संस्कृति का एक मूल तत्व प्रकट होता है—पितृआज्ञा पालन। रामायण में श्रीराम का वनगमन हो या महाभारत में पांडवों का सत्यनिष्ठ आचरण, हर जगह कर्तव्य को भावना से ऊपर रखा गया है।*
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*नचिकेता भी इसी परंपरा का वाहक है।*
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*यमलोक पहुँचकर उसे ज्ञात होता है कि यमराज अनुपस्थित हैं। अतिथि होकर भी वह तीन दिन तक बिना अन्न-जल यमपुरी के द्वार पर प्रतीक्षा करता है। अतिथि देवो भव—यह वैदिक सूत्र यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से उपस्थित है। जब यमराज लौटते हैं और उन्हें ज्ञात होता है कि एक ब्रह्मज्ञानी बालक तीन दिन तक भूखा-प्यासा उनकी प्रतीक्षा करता रहा, तो वे स्वयं अपराधबोध से भर उठते हैं। यही कारण है कि यमराज नचिकेता को तीन वरदान देने का प्रस्ताव रखते हैं।*
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*पहला वरदान नचिकेता अपने पिता के क्रोध की शांति और उनकी प्रसन्नता के लिए मांगता है। यह उसकी निस्वार्थता और पारिवारिक मूल्यों के प्रति आस्था को दर्शाता है।*
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*दूसरा वरदान वह अग्निविद्या के रूप में मांगता है—जिससे स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। यमराज उसे विस्तार से नचिकेता अग्नि का ज्ञान देते हैं, जिसका उल्लेख कठोपनिषद के प्रथम अध्याय में मिलता है।*
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*परंतु तीसरा वरदान इस संवाद को अमर बना देता है। नचिकेता प्रश्न करता है— “मृत्यु के बाद आत्मा रहती है या नहीं? कुछ कहते हैं । रहती है, कुछ कहते हैं नहीं—इसका सत्य क्या है?”*
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*यह प्रश्न आज भी मानव सभ्यता का सबसे बड़ा दार्शनिक प्रश्न है।*
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*यमराज इस प्रश्न से बचना चाहते हैं। वे नचिकेता को ऐश्वर्य, दीर्घायु, पुत्र, राज्य, भोग-विलास—सब कुछ देने का प्रलोभन देते हैं। किंतु नचिकेता का उत्तर अद्वितीय है—“ये सब क्षणिक हैं। इंद्रियों को क्षीण करने वाले हैं। मृत्यु तो सबको आनी है, फिर इनका क्या मूल्य?”*
*(कठोपनिषद 1.1.26)*
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*यहाँ सनातन धर्म का केंद्रीय सिद्धांत उभरता है—श्रेय और प्रेय का भेद। यमराज कहते हैं—“श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः।”*
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*अर्थात मनुष्य के सामने दो मार्ग होते हैं—एक तत्काल सुख देने वाला प्रेय और दूसरा आत्मकल्याणकारी श्रेय। विवेकी वही है जो श्रेय का चयन करे।*
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*अंततः यमराज आत्मतत्त्व का उपदेश देते हैं—आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। वह नित्य, शाश्वत और अविनाशी है—*
*“न जायते म्रियते वा विपश्चित्…”*
*(कठोपनिषद 1.2.18)*
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*यही भाव भगवद्गीता (2.20) में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को भी समझाया गया है, जो उपनिषदों और गीता की वैचारिक एकता को दर्शाता है।*
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*यमराज–नचिकेता संवाद हमें सिखाता है कि मृत्यु भय का नहीं, बल्कि बोध का विषय है। जो आत्मा को जान लेता है, उसके लिए मृत्यु केवल वस्त्र परिवर्तन के समान है। आज के भौतिकतावादी युग में, जहाँ प्रेय को ही जीवन का लक्ष्य मान लिया गया है, यह संवाद हमें ठहरकर सोचने को विवश करता है।*
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*नचिकेता सनातन धर्म का वह आदर्श है जो कहता है—सत्य कठिन हो सकता है, पर वही मुक्त करता है। और यही कारण है कि हजारों वर्षों बाद भी यमराज और नचिकेता का यह संवाद मानव चेतना को प्रकाश देता है*
🚨 *पत्रकार = शिवम कुमार अस्थाना*🚨
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