logo

“समानता नहीं, सवर्णों के लिए शैक्षणिक आपातकाल: मोदी सरकार ने स्कूल–कॉलेजों में लागू किया ‘चयनित उत्पीड़न’ का कानून”

✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा

खुलासा रिपोर्ट | विशेष विश्लेषण

जिस सरकार को सामान्य वर्ग ने राष्ट्रवाद, योग्यता और संतुलन की उम्मीद में सत्ता सौंपी थी, वही सरकार आज उच्च शिक्षा परिसरों को सवर्ण-विरोधी प्रयोगशाला में बदलने पर आमादा दिखाई दे रही है।

UGC द्वारा लागू ‘Promotion of Equity in Higher Education Regulations, 2026’ और इसके साथ जुड़ा SC/ST Act Amendment 2024 अब केवल कानून नहीं रहे—ये सामान्य वर्ग के लिए एक स्थायी भय-संहिता (Permanent Fear Code) बन चुके हैं।

अब शिक्षा नहीं, ‘संदेह’ का माहौल
इस नए तंत्र में:
• SC / ST / OBC = स्वतः पीड़ित
• General / सवर्ण = जन्म से संदिग्ध
अब सवाल योग्यता का नहीं,अब सवाल तर्क का नहीं,अब सवाल प्रमाण का भी नहीं—अब सिर्फ “फीलिंग हर्ट” ही पर्याप्त है।

कानून की सबसे खतरनाक धार कहाँ है?
🔴 1. अपराध की अनंत परिभाषा
अब अपराध केवल जाति-सूचक गाली नहीं है। अब अपराध है:
• “प्रतिकूल व्यवहार”
• “मानवीय गरिमा के खिलाफ आचरण”
• “भावनात्मक आघात”
• “डिजिटल असहजता”
यानि—आप चुप रहें तब भी दोषी,आप बोलें तब भी दोषी,आप नंबर काटें तब भी दोषी।

🔴 2. Equity Squad = शैक्षणिक निगरानी दस्ता अब विश्वविद्यालयों में Equity Squad घूमेगी—देखेगी:
• कौन क्या बोल रहा है
• कौन किससे बहस कर रहा है
• कौन किसे कम नंबर दे रहा है
यह शिक्षा संस्थान हैं या विचार सुधार शिविर (Reform Camps)?

🔴 3. झूठी शिकायत पर कोई सजा नहीं
UPA के 2012 नियमों में भी इतना साहस नहीं था। तब:
• गलत शिकायत पर दंड था
अब:
• शिकायतकर्ता पूर्णतः सुरक्षित
• आरोपी पूर्णतः असुरक्षित
यानी कानून नहीं, खुली तलवार।

अब कल्पना नहीं, हकीकत समझिए
• सवर्ण छात्र ने नोट्स देने से मना किया → प्रतिकूल व्यवहार
• बहस में असहमति जताई → मानसिक उत्पीड़न
• प्रोफेसर ने कम अंक दिए → गरिमा का हनन
• फिल्म, राजनीति या इतिहास पर चर्चा हुई → डिजिटल/भावनात्मक अपराध
अब पढ़ाई नहीं होगी, अब केस मैनेजमेंट होगा।

सबसे बड़ा सवाल: मोदी सरकार की विवशता या रणनीति?
क्या सामान्य वर्ग अब:
• वोट बैंक नहीं रहा?
• केवल टैक्स देने वाली मशीन बन गया?
• सिर्फ “झेलने के लिए पैदा” हुआ है?
जिस समाज ने:
• प्रशासन दिया
• विज्ञान दिया
• शिक्षा की रीढ़ बनाई
आज उसी समाज से कहा जा रहा है— “चुप रहो, सहो, और शक के दायरे में जियो।”

इतिहास गवाह है…
अंग्रेज़ों ने भी सीखा था—यदि शासन करना है तो बुद्धिजीवियों को कमजोर करो। आज वही प्रयोग कानून की मुहर के साथ दोहराया जा रहा है।

निष्कर्ष (चेतावनी नहीं, यथार्थ)
यह कानून:
• समानता नहीं लाएगा
• सामाजिक समरसता नहीं बढ़ाएगा
• बल्कि स्थायी सामाजिक विस्फोट की नींव रखेगा
यदि आज सामान्य वर्ग चुप रहा,तो कल शिक्षा नहीं बचेगी,परसों अभिव्यक्ति नहीं बचेगी, और फिर लोकतंत्र केवल नाम का रह जाएगा।

“जिस सरकार को सवर्णों ने सत्ता दी, वही सरकार आज उनके भविष्य की कब्र खोद रही है—अब मिट्टी डालना बाकी है।”

इस कानून का सीधा और खतरनाक परिणाम: इस कानून का सबसे भयावह परिणाम यह होगा कि यदि सवर्ण समाज का कोई छात्र पढ़ाई में आगे निकलता है, मेधावी होता है, प्रतिस्पर्धा में टिकता है, तो उसे हराने के लिए अब किताब या मेहनत नहीं—सिर्फ एक झूठा आरोप ही काफी होगा।

अब कोई भी SC/ST/OBC छात्र, बिना प्रमाण, बिना जांच,सिर्फ “मानवीय गरिमा आहत हुई” या “प्रतिकूल व्यवहार हुआ” कहकर सवर्ण छात्र को कॉलेज या स्कूल से बाहर का रास्ता दिखा सकेगा।
यह शिक्षा व्यवस्था नहीं, योग्यता का दमन तंत्र बन जाएगा। मेहनत करने वाला डर में जिएगा, और आरोप लगाने वाला सुरक्षित रहेगा।
अब सवाल यह नहीं रहेगा कि कौन ज़्यादा पढ़ा-लिखा है, सवाल यह होगा कि किसके पास ज़्यादा कानूनी हथियार है।

एक पंक्ति में तीखा प्रहार (अगर चाहें तो पोस्टर/सोशल मीडिया के लिए): “अब कॉलेज में आगे वही बढ़ेगा, जो पढ़ाई में नहीं—आरोप लगाने में माहिर होगा।”

यह कानून सवर्ण समाज के मेधावी बच्चों के लिए साफ संदेश है— पढ़ोगे तो फंसोगे, आगे बढ़ोगे तो कुचले जाओगे। अब प्रतिस्पर्धा क्लासरूम में नहीं, थाने और कमेटियों में लड़ी जाएगी।

3
1415 views