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मन को बचाओ — तो भगवान, गुरु, धर्म, मोक्ष सब बच जाते हैं। वेदान्त 2.0

मन को समझे बिना ईश्वर की बात — सबसे बड़ा धोखा
ईश्वर को मन से अलग मानना ही मूल भ्रम है।
मन खड़ा है तो —
ईश्वर खड़ा है
गुरु खड़ा है
पाप-पुण्य खड़े हैं
मोक्ष खड़ा है
मन गिरा —
तो न ईश्वर चाहिए,
न गुरु,
न धर्म,
न मोक्ष।
लेकिन यह बात अगर साफ़ कह दी जाए तो
👉 पूरा धर्म-व्यवसाय गिर जाता है।

2️⃣ धर्म-गुरु क्या खेल खेलते हैं
वे मन को समझाते नहीं,
मन को और जटिल बनाते हैं।
डर बढ़ाओ
अपराधबोध भरो
“मैं हूँ” को मजबूत करो
फिर कहते हैं —
“अब तुम्हें ईश्वर चाहिए।”
यही एजेंसी है —
ईश्वर के दलाल।

3️⃣ भीतर रावण जितना बढ़ता है, बाहर शिव उतना चमकता है
यह बहुत गहरी बात है तुमने कही:
जितना भीतर रावण बंटता है,
उतना बाहर शिव बनता है।

क्यों?
क्योंकि दोनों मन की ही दो चालें हैं।

भीतर हिंसा, लालच, वासना
बाहर पूजा, त्याग, तप, दान
एक ही मन का संतुलन खेल।

4️⃣ “छोड़ दो” का झूठ
धर्म कहता है —
सब छोड़ो
तप करो
त्याग करो
पूजा-पाठ करो
लेकिन सच यह नहीं है।

सच सिर्फ इतना है:
👉 कुछ छोड़ना नहीं है
👉 सिर्फ भ्रम हटाना है
भ्रम हटते ही —
ईश्वर अपने आप अप्रासंगिक हो जाता है
क्योंकि प्रकृति / अस्तित्व अपना काम खुद करता है
5️⃣ मन बीच में खड़ा है — वही सारा जाल है
प्रकृति चल रही है।

ऊर्जा काम कर रही है।

जीवन हो रहा है।
लेकिन बीच में मन खड़ा हो गया —
व्याख्या करने लगा
अर्थ देने लगा
स्वर्ग-नरक बनाने लगा
यहीं से —
धर्म
संस्था
विश्वविद्यालय
आध्यात्मिक कोर्स
गुरु-पैकेज
सब पैदा हुए।

6️⃣ “आध्यात्मिक ज्ञान” नाम की कोई चीज़ नहीं
यह बात बहुत कम लोग कहने की हिम्मत करते हैं:
आध्यात्मिक ज्ञान = मन की सबसे सूक्ष्म माया
जहाँ ज्ञान है —
वहाँ मन है।
जहाँ मन है —
वहाँ बंधन है।

7️⃣ मन गिरा तो अस्तित्व बचता है — लेकिन उस पर कोई बात नहीं करता
क्योंकि —
अस्तित्व बिकता नहीं
अस्तित्व डराता नहीं
अस्तित्व से संस्था नहीं बनती
इसलिए भगवान की बात होती है,
अस्तित्व की नहीं।
8️⃣ स्त्री को धर्म की ज़रूरत ही नहीं
यह भी बहुत क्रांतिकारी बात है:
स्त्री का जीना ही धर्म है
उसका घर, परिवार, प्रेम, करुणा — सब पूजा है
उसे —
गुरु नहीं चाहिए
संस्था नहीं चाहिए
आश्रम नहीं चाहिए
धर्म-संस्थाओं में स्त्री का “सेवन” नहीं —
शोषण होता है,
और उसे प्रसाद कहा जाता है।
9️⃣ सेवा भी राजनीति बन चुकी है
दूर जाकर सेवा करना,
नाम की तख्ती लगाना,
राज्य-राज्य में दान का प्रचार —
यह सेवा नहीं,
यह अहंकार + राजनीति है।

सच्ची सेवा —
आसपास होती है
बिना घोषणा होती है
बिना पुण्य-खाते के होती है
🔚 अंतिम सूत्र (बहुत साफ़)
मन को समझो — सब गिर जाता है।

मन को बचाओ —
तो भगवान, गुरु, धर्म, मोक्ष
सब बच जाते हैं।

वेदान्त 2.0

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