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रतलाम ड्रग फैक्ट्री कांड: सफेदपोश सियासत के पीछे 'नशे' का खूनी खेल, क्या 'सीरिया' बनने की राह पर है शांत मध्य प्रदेश?

✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा

रतलाम/भोपाल। मध्य प्रदेश, जिसे देश का सबसे शांत टापू कहा जाता था, आज अपराधियों और नशा माफियाओं की सुरक्षित पगाह बन चुका है। रतलाम में पकड़ी गई 'एमडी ड्रग फैक्ट्री' (MD Drug Factory) ने यह साबित कर दिया है कि प्रदेश में प्रशासन की नाक के नीचे किस कदर मौत का सामान तैयार किया जा रहा है। इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू 'आजाद समाज पार्टी' के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष दिलावर खान पठान का नाम आना है, जो समाजसेवा का चोला ओढ़कर नशे का साम्राज्य चला रहा था।

सेना की फर्जी आईडी और हथियारों का जखीरा: बड़ी साजिश की बू?
पुलिस की छापेमारी में केवल ड्रग्स ही नहीं, बल्कि दिलावर के बेटे के नाम पर भारतीय सेना की फर्जी आईडी (Indian Army Fake ID) और पुलिस की वर्दी भी बरामद हुई है। सवाल यह उठता है कि एक ड्रग माफिया को सेना और पुलिस की फर्जी पहचान की क्या जरूरत थी? क्या यह किसी बड़े आतंकी हमले या देशविरोधी साजिश का हिस्सा था? इसके साथ ही 12 बोर की बंदूकें और जिंदा कारतूसों का मिलना यह बताता है कि यह सिंडिकेट कितना खतरनाक है।

भीम आर्मी और राजनीतिक फंडिंग का 'नशा' कनेक्शन
आजाद समाज पार्टी और भीम आर्मी जैसे संगठन, जो खुद को शोषितों की आवाज बताते हैं, उनके नेताओं का ऐसे घिनौने धंधों में संलिप्त होना इनके असली चेहरे को उजागर करता है। दिलावर खान ने 2023 में इसी पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ा था। आखिर इन संगठनों को पाल-पोस कौन रहा है? इस ड्रग सिंडिकेट का जाल राजस्थान, गुजरात, मुंबई और दुबई तक फैला हुआ है। क्या नशे की इस काली कमाई का इस्तेमाल इन संगठनों की फंडिंग और देश में अस्थिरता फैलाने के लिए किया जा रहा है?

कोमा में प्रशासन: मुख्यमंत्री और गृहमंत्री से सीधे सवाल
जब राजधानी भोपाल में 'ड्रग फैक्ट्री' का पर्दाफाश हुआ था, तभी यह साफ हो गया था कि खुफिया विभाग पूरी तरह फेल हो चुका है। अब रतलाम की घटना ने प्रशासन की पोल खोल दी है। मुख्यमंत्री, जिनके पास गृह विभाग की भी जिम्मेदारी है, उनसे तीखे सवाल पूछे जा रहे हैं:
• क्या मध्य प्रदेश अब अपराधियों के लिए 'सेफ हेवन' बन गया है?
• क्या इन माफियाओं को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है जो वे इतने बेखौफ होकर फैक्ट्री चला रहे थे?
• 10 फीट ऊँची बाउंड्रीवॉल और सीसीटीवी से लैस आलीशान मकानों में क्या हो रहा है, इसकी भनक स्थानीय पुलिस को क्यों नहीं लगी?


जनता का आक्रोश: "जय श्री राम" के नारों से गूँजा इलाका:

आरोपी दिलावर और उसके परिवार के आतंक का आलम यह था कि ग्रामीण अपनी जमीनें छीनने और बेघर होने के बावजूद बोलने से डरते थे। लेकिन जब पुलिस ने इस गिरोह को पकड़ा, तो ग्रामीणों ने "जय श्री राम" के नारे लगाकर अपनी खुशी जाहिर की और आरोपियों का जुलूस निकालने की मांग की।
निष्कर्ष: यह घटना केवल नशे के कारोबार तक सीमित नहीं है। यह राष्ट्र की सुरक्षा और मध्य प्रदेश के भविष्य पर हमला है। यदि समय रहते 'राजनीतिक चोला' ओढ़े इन भेड़ियों और उनके संरक्षकों को बेनकाब नहीं किया गया, तो प्रदेश को 'सीरिया' जैसी अराजकता की ओर बढ़ने से कोई नहीं रोक पाएगा।

रतलाम में पकड़ी गई इस ड्रग फैक्ट्री में भारतीय सेना की फर्जी आईडी और पुलिस की वर्दी का मिलना महज़ एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक गहरी और भयावह साजिश की ओर इशारा करता है. जब एक ड्रग सिंडिकेट का जाल दुबई जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक फैला हो और उसके पास सेना की पहचान हो, तो जांच की सुई स्वाभाविक रूप से आतंकी कनेक्शनों की ओर मुड़ती है.
प्रशासन और जांच एजेंसियों के लिए अब निम्नलिखित बिंदु जांच का मुख्य केंद्र होने चाहिए:

जांच के घेरे में 'देशविरोधी' साजिश
• सेना की फर्जी आईडी का उद्देश्य: ड्रग माफिया दिलावर खान के बेटे अजहर के पास से सेना की फर्जी आईडी मिलना यह सवाल खड़ा करता है कि क्या इसका उपयोग संवेदनशील और प्रतिबंधित क्षेत्रों में घुसपैठ करने के लिए किया जा रहा था?
• आतंकी संगठनों से सांठगांठ: जिस तरह से इस सिंडिकेट का अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन सामने आया है, यह पता लगाना अनिवार्य है कि कहीं ड्रग्स की इस काली कमाई का इस्तेमाल भारत में अस्थिरता फैलाने वाले आतंकी संगठनों की फंडिंग के लिए तो नहीं हो रहा था?
• पुलिस वर्दी का दुरुपयोग: अपराधियों के पास से पुलिस की वर्दी बरामद होना इस बात का संकेत है कि वे कानून की आड़ में किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने या सुरक्षा घेरे को भेदने की तैयारी में थे.
• हथियारों का जखीरा: मौके से 12 बोर की बंदूकें और 91 जिंदा कारतूस मिलना यह साबित करता है कि यह गिरोह केवल नशा बेचने तक सीमित नहीं था, बल्कि एक सशस्त्र विद्रोही गुट की तरह काम कर रहा था.

प्रशासन की जिम्मेदारी और राष्ट्रीय सुरक्षा
यह मामला अब केवल प्रदेश की कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बन चुका है. यदि राजनीतिक रसूख और "समाजसेवी" का चोला ओढ़कर ऐसे लोग सेना की गरिमा का अपमान कर रहे हैं, तो इन पर देशद्रोह के तहत कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए. प्रशासन को अब यह भी स्पष्ट करना होगा कि आखिर इतनी बड़ी तैयारी और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क उनकी नजरों से ओझल कैसे रहा?

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