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बाल विवाह मुक्त भारत के तहत शिवगंज सामुदायिक भवन में सभा आयोजित

बाल विवाह मुक्त भारत के तहत शिवगंज सामुदायिक भवन में सभा आयोजित

नन्द कुमार सिंह /ब्यूरो चीफ, राष्ट्रीय प्रसार

औरंगाबाद/बिहार --भारत को बाल विवाह मुक्त बनाने के लिये जागरूकता अभियान के तहत आज प्रखंड के शिवगंज सामुदायिक भवन सहित कई जगहों पर सभा आयोजित किया गया ,जिला विधिक सेवा प्राधिकार के चेयरमैन राजकुमार एवं जिला विधिक सेवा अधिकार के सचिव तान्या पटेल के आदेश से औरंगाबाद जिला के सभी प्रखंडों में बाल विवाह मुक्त भारत का आयोजन होना है ,
मदनपुर प्रखंड में अधिकार मित्र रोहित कुमार ,विकास कुमार पाठक ,रोमा पाठक प्रखंड के सभी गांव में बाल विवाह मुक्त अभियान का आयोजन कर रहे हैं !अधिकार मित्र रोहित कुमार ने प्रेस को सूचना देते हुए बताया कि यह आयोजन जिला विधिक सेवा प्राधिकार के चेयरमैन राजकुमार एवं जिला विधिक सेवा अधिकार के सचिव तान्या पटेल के आदेश से किया जा रहा है ।
आप सभी को बताते चसले की बाल विवाह कानून (बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006) भारत में 18 साल से कम उम्र की लड़की और 21 साल से कम उम्र के लड़के के विवाह को प्रतिबंधित करता है, इसे एक कानूनी अपराध बनाता है, जिसमें बाल विवाह कराने वालों को 2 साल तक की कैद और 1 लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान है, साथ ही पीड़ितों को राहत और कानूनी सहायता भी मिलती है, ताकि बाल विवाह पूरी तरह रुक सकें।

मुख्य बातें:

कानूनी उम्र: लड़की के लिए 18 साल और लड़के के लिए 21 साल न्यूनतम विवाह योग्य आयु है।
अपराध: --इस उम्र से पहले शादी करना कानूनन अपराध है और दंडनीय है।
सजा: --बाल विवाह कराने वालों (माता-पिता, आयोजक आदि) को 2 साल तक की कठोर कैद और/या 1 लाख रुपये जुर्माना हो सकता है।
अवैध और अमान्य: बाल विवाह को जिला न्यायालय में चुनौती देकर रद्द (अमान्य) करवाया जा सकता है।

पीड़ितों के लिए प्रावधान
कानून पीड़ितों (लड़की/लड़के) को भरण-पोषण और बच्चों के लिए कानूनी मान्यता व भरण-पोषण की सुरक्षा देता है।
जागरूकता और शिकायत
बाल विवाह रोकने के लिए चाइल्ड लाइन (1098) और बाल विवाह निषेध अधिकारी (CMPO) की नियुक्ति की जाती है, जहाँ गोपनीय शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

यह कानून क्यों लाया गया?
यह अधिनियम पुराने बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929 (शारदा अधिनियम) की जगह लाया गया, जिसका उद्देश्य बाल विवाह को केवल नियंत्रित करने के बजाय पूरी तरह प्रतिबंधित करना और पीड़ितों को अधिक मजबूत कानूनी सुरक्षा और राहत प्रदान करना है, खासकर सामाजिक-आर्थिक समस्याओं और जागरूकता की कमी से जूझ रही महिलाओं के लिए।

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