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चिरकुंडा का चुनावी रण: जब 'कुर्सी' पर भारी पड़ा 'संकल्प'!

चिरकुंडा: सत्ता के गलियारों में सन्नाटा, मगर सड़कों पर 'पिंकी फाउंडेशन' का शोर; इस बार बदल रही है सियासत की परिभाषा.
चिरकुंडा की फिजाओं में इस बार चुनावी शोर तो है, लेकिन जनता की आँखों में पुराने वादों का हिसाब भी है। जहां एक ओर निवर्तमान जनप्रतिनिधियों की उदासीनता ने शहर के विकास पर 'ब्रेक' लगा दिया, वहीं दूसरी ओर 'पिंकी फाउंडेशन' ने यह साबित कर दिया है कि समाज बदलने के लिए चुनाव जीतने की नहीं, दिल जीतने की जरूरत होती है।
लोकतंत्र के महापर्व में अक्सर वादों की बारिश होती है लेकिन जनता ने जिन्हें 'माननीय' बनाकर कुर्सी सौंपी, वे वादे करके भूल गए।
सड़कें, नालियां और बुनियादी सुविधाएं फाइलों में तो सुधरीं, मगर हकीकत में जस की तस रहीं।
ठीक इसी निराशा के अंधेरे में, 'पिंकी फाउंडेशन' एक उम्मीद की मशाल बनकर उभरा। जब चुने हुए नुमाइंदे सत्ता सुख में व्यस्त थे, तब फाउंडेशन की टीम चिरकुंडा की गलियों में पसीना बहा रही थी।
फाउंडेशन ने एक बहुत बड़ा भ्रम तोड़ा है—"समाज सेवा के लिए पद की जरूरत होती है।"
बिना किसी सरकारी ठप्पे और बिना किसी राजनीतिक कुर्सी के, पिंकी फाउंडेशन ने चिरकुंडा को एक 'आदर्श' (Idol Place) बनाने का जो बीड़ा उठाया है, उसने बड़े-बड़े राजनेताओं की नींद उड़ा दी है। उनका संदेश साफ़ है: विकास फाइलों से नहीं, फौलादी इरादों से होता है।

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