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झालावाड़ कृषि विज्ञान केंद्र किसानों को दे रहा सीधा लाभ: नवीनतम तकनीकों और क्रॉप कैफेटेरिया से मिल रही मदद

झालावाड़ कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों और कृषि विद्यार्थियों के लिए एक 'फसल संग्रहालय' (क्रॉप कैफेटेरिया) विकसित किया है। केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. संतोष झाझड़िया ने बताया कि इसका उद्देश्य विभिन्न फसलों की उन्नत किस्मों का प्रत्यक्ष अवलोकन कराना है। इससे किसानों को मौसम, मिट्टी और जल संसाधनों के अनुरूप फसल चयन तथा वैज्ञानिक खेती की जानकारी मिल रही है।
क्रॉप कैफेटेरिया किसानों को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रखता, बल्कि खेतों में प्रयोगात्मक तरीके से यह बताता है कि किस क्षेत्र, जल उपलब्धता और मौसम के अनुसार कौन-सी फसल अधिक लाभकारी सिद्ध हो सकती है। इससे किसान बेहतर योजना बनाकर खेती कर सकते हैं।
इस कैफेटेरिया में एक ही फसल की कई किस्में लगाई गई हैं, जिससे किसान यह समझ पाते हैं कि कम पानी, अल्प अवधि में पकने वाली या अधिक उत्पादन देने वाली किस्में कौन-सी हैं। यहां पशु चारे, दलहन, तिलहन और अनाज फसलों की उन्नत किस्में प्रदर्शित की गई हैं। कुछ किस्में ऐसी भी हैं जिनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है, जिससे उत्पादन लागत कम होती है।
जिले की जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, केंद्र ने ऐसी फसली किस्मों का चयन किया है जो गर्मी की शुरुआत से पहले पक जाती हैं। इससे फसलों को अत्यधिक तापमान से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है और किसानों की आय में वृद्धि संभव हो सकती है।
केंद्र में जैव-संवर्धित (बायो फोर्टिफाइड) किस्मों का भी प्रदर्शन किया गया है। ये वे फसल किस्में होती हैं जिनमें प्राकृतिक रूप से आयरन, जिंक, प्रोटीन और विटामिन जैसे पोषक तत्वों की मात्रा अधिक होती है। इन किस्मों का विकास वैज्ञानिक विधियों से कुपोषण को कम करने के उद्देश्य से किया गया है।
बायो फोर्टिफाइड फसलों का उत्पादन सामान्य किस्मों के समान ही होता है, लेकिन इनका पोषण मूल्य अधिक होता है। इनके उपयोग से बेहतर स्वास्थ्य के साथ-साथ किसानों को अच्छा बाजार मूल्य भी प्राप्त होता है।
क्रॉप कैफेटेरिया की एक और विशेषता यह है कि किसान केवल सैद्धांतिक जानकारी ही नहीं लेते, बल्कि फसलों की बुवाई से लेकर उनकी वृद्धि और पकने की अवस्था तक को प्रत्यक्ष रूप से देख पाते हैं।
फसल चक्र के अनुसार क्रॉप कैफेटेरिया का प्रदर्शन
केन्द्र द्वारा हर मौसम में जिले की जलवायु और फसल चक्र को ध्यान में रखते हुए नया क्रॉप कैफेटेरिया विकसित किया जाता है। रबी मौसम में गेहूं, सरसों, चना, मसूर, मैथी, अलसी, धनियां इत्यादि फसलों की विभिन्न किस्में तथा खरीफ मौसम में सोयाबीन, मक्का, उड़द, मूंग आदि फसलों का प्रदर्शन किया जाता है।

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