
माइनस 40 पर डॉक्टर! अब अस्पताल नहीं, किस्मत के भरोसे छोड़ी जाएगी ज़िंदगी”
नई दिल्ली। भोपाल
✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा
अगर किसी देश में डॉक्टर बनने के लिए माइनस 40 अंक भी काफी हों, तो समझ लीजिए उस देश में अब इलाज नहीं—प्रयोग होने वाला है।
NEET-PG 2025 को लेकर NBEMS द्वारा जारी ताज़ा नोटिफिकेशन ने भारत की चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था को नंगा कर दिया है। कुछ श्रेणियों में क्वालिफाइंग परसेंटाइल को 0 तक और स्कोर को माइनस 40 तक गिरा दिया गया है।
यह फैसला कोई सुधार नहीं, यह एक राष्ट्रीय अपराध जैसा कदम है।देश पूछ रहा है—
👉 क्या अब डॉक्टर बनने के लिए पढ़ाई नहीं, सिर्फ परीक्षा हॉल में मौजूद रहना काफी है?
👉 क्या अब मरीज भगवान नहीं, भगवान भी डॉक्टर से डरेंगे?
सरकार वर्षों से कहती आई है—“हम विश्वगुरु बनेंगे” लेकिन ज़मीन पर हकीकत यह है कि यहाँ जीवन और मृत्यु के बीच खड़े पेशे में भी न्यूनतम योग्यता खत्म की जा रही है।
डॉक्टर कोई आरक्षण आधारित बाबू नहीं, डॉक्टर वह होता है जिसके हाथ में सीधे इंसान की सांसें होती हैं। यहाँ गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती।
अगर कोई अभ्यर्थी शून्य से भी नीचे अंक ला रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है—
👉 क्या उसे मानव शरीर की बुनियादी समझ भी है?
👉 क्या उसे इंजेक्शन और हथियार में फर्क पता है?
और अगर फिर भी वही “डॉक्टर” बनेगा, तो यह सिर्फ डिग्री का मज़ाक नहीं— जनता की ज़िंदगी के साथ सीधा धोखा है।
अब तो हालात ऐसे बन रहे हैं कि अस्पताल जाने से पहले लोग डॉक्टर की नेम प्लेट नहीं, अपनी किस्मत देखेंगे। सरकार को यह समझना होगा कि सामाजिक न्याय का अर्थ अयोग्यता को बढ़ावा देना नहीं होता। न्याय का मतलब होता है—समान अवसर,न कि समान परिणाम, चाहे ज्ञान हो या न हो।
आज जो हो रहा है, वह न शिक्षा है, न सुधार, न न्याय— यह सिर्फ राजनीतिक सुविधा और आंकड़ों का खेल है।
अगर यही रास्ता रहा, तो आने वाले समय में भारत में डॉक्टरों की नहीं, डर की कमी नहीं रहेगी।
यह अंतिम चेतावनी है—
👉 चिकित्सा शिक्षा में योग्यता से समझौता बंद करें
👉 न्यूनतम ज्ञान को अनिवार्य बनाएं
👉 और जनता की ज़िंदगी को प्रयोगशाला न बनाएं
क्योंकि जब डॉक्टर अयोग्य होंगे,तो मरीज नहीं—पूरा देश आईसीयू में जाएगा।