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आखिर पूर्व मुख्यमंत्री और आईपीएस आलोक सिंह के बीच टकराव की जड़ क्या है?

इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए हमें वर्ष 2008 के मेरठ तिहरे हत्याकांड की पृष्ठभूमि में जाना होगा—एक ऐसा जघन्य अपराध, जिसने न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश को झकझोर दिया था।
🔴 मेरठ तिहरा हत्याकांड – 2008
22 मई 2008 को मेरठ के गुदड़ी बाजार क्षेत्र से तीन हिंदू युवकों का अपहरण होता है।
23 मई 2008 को गंगनहर, बिलौना के पास एक स्टीम कार से तीनों युवकों के शव बरामद होते हैं।
जांच में मृतकों की पहचान—
सुनील ढाका
सुधीर उज्ज्वल
पुनीत गिरी
के रूप में होती है। तीनों मेरठ के निवासी और इंजीनियरिंग के छात्र थे।
🔴 हत्या की बर्बरता
पोस्टमार्टम और पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि—
पहले तीनों को बेरहमी से पीटा गया
फिर जानवर काटने वाले चापड़ से गला रेता गया
अंत में गोली मारी गई
शरीर से जो गोली बरामद हुई, वह 1987 के मेरठ दंगों में लापता सरकारी रिवॉल्वर की थी—जो अपने आप में बेहद गंभीर तथ्य था।
🔴 आईपीएस आलोक सिंह की एंट्री
इस निर्मम हत्याकांड से मेरठ का हिंदू समाज उबल पड़ा। व्यापारी सड़कों पर उतर आए।
तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने इस केस को सुलझाने के लिए तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी आलोक सिंह को मेरठ भेजा।
👉 चार्ज लेने के मात्र 24 घंटे के भीतर आलोक सिंह के नेतृत्व में पुलिस ने केस सुलझा लिया।
🔴 आरोपी कौन थे?
मुख्य आरोपी—
हाजी इजलाल (सपा नेता व मीट कारोबारी)
उसका भाई हाजी एहिमताद
इजलाल की प्रेमिका शिबा सिरोही
सहित कुल 13 आरोपी
पुलिस ने—
हत्या में प्रयुक्त चापड़
चोरी की सरकारी रिवॉल्वर
घटना में इस्तेमाल वाहन
खून से सनी चादर
सब कुछ बरामद कर आरोपियों को जेल भेजा।
🔴 न्याय की लंबी लड़ाई
मामला वर्षों तक न्यायालय में चला।
इस दौरान—
आरोपी बार-बार जमानत की कोशिश करते रहे
आईपीएस आलोक सिंह हर बार मजबूती से जमानत निरस्त करवाते रहे
पीड़ित परिवार के साथ खड़े रहकर न्याय की लड़ाई लड़ते रहे
🔴 2012 के बाद प्रताड़ना
2012 में सरकार बदलते ही—
आलोक सिंह को एक जिले से दूसरे जिले में भेजा जाने लगा
मानसिक व प्रशासनिक दबाव बनाया गया
यहां तक कि “सरकारी व्यवहार” के आधार पर आरोपियों को रिहा करने की कोशिश भी हुई
लेकिन पीड़ित परिवार और सामाजिक संगठनों के तीव्र विरोध के कारण सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े।
🔴 2017 के बाद: ऑपरेशन क्लीन
2017 में सरकार बदलने के बाद आलोक सिंह को पुनः मेरठ जोन भेजा गया।
योगी सरकार के “ऑपरेशन क्लीन” के तहत—
पश्चिमी यूपी में अपराधियों का नेटवर्क ध्वस्त हुआ
मुकीम काला गैंग जैसे खौफनाक गिरोह पूरी तरह समाप्त हुए
अपराधी स्वयं थानों में आकर आत्मसमर्पण करने लगे
🔴 अंतिम न्याय – 16 साल बाद
2022 में हाजी इजलाल को हाईकोर्ट से जमानत मिलती है,
लेकिन एक बार फिर—
पीड़ित परिवार
और आईपीएस आलोक सिंह
न्यायालय जाते हैं।
👉 स्पीड ट्रायल के माध्यम से
👉 16 वर्षों बाद
👉 तिहरे हत्याकांड के सभी आरोपियों को
👉 आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाती है।
🔴 यही है असली कारण
यह सब संभव हो पाया—
आलोक सिंह की कर्तव्यनिष्ठा
न्याय के प्रति अडिग प्रतिबद्धता
राजनीतिक दबावों के सामने न झुकने के साहस
और जनता के प्रति ईमानदार समर्पण के कारण।
🔴 आलोक सिंह: एक रिकॉर्ड
2001–02 में नक्सल प्रभावित सोनभद्र में तैनाती
नक्सलवाद की कमर तोड़ने वाले अधिकारी के रूप में पहचान
वर्तमान में कानपुर जोन के एडीजी
खनन माफिया और भू-माफियाओं पर निर्णायक प्रहार
निष्कर्ष
जब कोई अधिकारी अपराध, माफिया और सत्ता के गठजोड़ को तोड़ता है,
तो स्वाभाविक है कि वह कई लोगों की आँखों में खटकता है।
👉 आईपीएस आलोक सिंह इसी ईमानदारी और निर्भीकता की कीमत चुका रहे हैं।
और शायद यही कारण है कि कुछ पूर्व मुख्यमंत्री आज भी उनसे असहज दिखाई देते हैं।
यदि आप चाहें, तो मैं इसे
✔️ प्रेस लेख,
✔️ सोशल मीडिया पोस्ट,
✔️ पत्रिका हेतु विश्लेषण,
✔️ या भाषण सामग्री
के रूप में भी ढाल सकता हूँ।

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