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जब तक धर्म आत्मा नहीं बनेगा और कर्मकाण्ड साधन नहीं रहेगा, तब तक भारत इतिहास से नहीं, अपने ही भ्रम से हारता रहेगा।

बुद्ध, पाखंड और भारत की ऐतिहासिक भूल
धर्म नहीं, पाखंड ने भारत को कमजोर किया
भारत में बुद्ध का उदय किसी आकस्मिक धार्मिक घटना का परिणाम नहीं था।

यह उस समय की अनिवार्य प्रतिक्रिया थी, जब कर्मकाण्ड आत्मा से कट चुका था और धर्म सत्ता, भय और व्यापार का औज़ार बन गया था।

बुद्ध व्यक्ति नहीं थे।

वे बोध थे — आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति।
जो लोग बुद्ध को व्यक्ति मानते हैं, वही उन्हें “नपुंसक”, “राष्ट्रविरोधी” या “नकारात्मक” कहते हैं।

क्योंकि व्यक्ति पर आरोप लगाए जा सकते हैं,
बोध पर नहीं।

कर्म और कर्मकाण्ड का मूल अंतर
कर्म आध्यात्मिक है।
कर्मकाण्ड तकनीकी है।

कर्म = चेतना से उत्पन्न क्रिया
कर्मकाण्ड = सीखी हुई प्रक्रिया
जब कर्मकाण्ड आत्मा के बिना चलता है,
तो वह पाखंड बन जाता है।

भारत में यही हुआ।

धर्म को विज्ञान नहीं, व्यवसाय बना दिया गया।

अनुष्ठान साधना नहीं रहे,
वे सामाजिक नियंत्रण का साधन बन गए।

बुद्ध का आगमन इसी पृष्ठभूमि में हुआ।

बुद्ध का सबसे बड़ा अपराध
बुद्ध ने कुछ नया नहीं सिखाया।

उन्होंने जो अप्राकृतिक था, उसे गिरा दिया।

उन्होंने कहा—
मत मानो, पहले देखो।
यह वाक्य ही सत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा था।

पुजारी डर गए
राजा असहज हो गए
धार्मिक व्यापार चरमराने लगा
यहीं से बुद्ध का विरोध शुरू हुआ।

“नपुंसक बुद्ध” — एक राजनीतिक आरोप
यदि बुद्ध का दर्शन नपुंसक होता,
तो चीन, जापान, कोरिया, वियतनाम जैसी सभ्यताएँ
इतिहास में कैसे टिकतीं?
वहाँ:
अनुशासन है
कार्यसंस्कृति है
विज्ञान और चेतना का संतुलन है
क्योंकि बुद्ध का धर्म बिना कर्मकाण्ड का धर्म है —
सीधा चेतना से जुड़ा हुआ।

नपुंसकता बुद्ध में नहीं थी,
नपुंसकता पाखंड में थी।

भारत की गुलामी का असली कारण
भारत को न मुगलों ने हराया,
न अंग्रेजों ने।

भारत को पाखंड ने हराया।

जाति व्यवस्था → विभाजन
अंधविश्वास → भय
धर्म → सत्ता का औज़ार
विदेशी शक्तियों ने केवल इस कमजोरी का उपयोग किया।

जब समाज अंदर से टूटा हो,
तो बाहर से कोई भी आकर शासन कर सकता है।

बुद्ध का भारत से “भगाना”
बुद्ध का भारत से लुप्त होना
किसी धार्मिक विफलता का प्रमाण नहीं है।

यह प्रमाण है कि
पाखंड आत्मा को सहन नहीं कर सकता।

जहाँ आत्मा प्रकट होती है,
वहाँ डर पैदा होता है।
डर का परिणाम—
बदनामी
विरोध
निष्कासन
यही बुद्ध के साथ हुआ।

आज की राजनीति और धर्म
आज भी स्थिति बदली नहीं है।

राजनीति:
विकास की भाषा बोलती है
लेकिन धुरी अब भी धर्म है
पक्ष और विपक्ष अलग दिखते हैं,
पर दोनों धर्म को सत्ता का उपकरण मानते हैं।

विज्ञान साधन है,
धर्म नियंत्रण का माध्यम।

यही कारण है कि भारत आज भी
विकास-प्रधान नहीं, पहचान-प्रधान राजनीति में फंसा है।

निष्कर्ष
बुद्ध भारत की कमजोरी नहीं थे।

वे भारत की अंतिम चेतावनी थे।

भारत ने बुद्ध को नहीं समझा,
क्योंकि भारत पाखंड को छोड़ने को तैयार नहीं था।
बुद्ध आत्मा थे।

पाखंड सत्ता था।

और सत्ता ने आत्मा को देश से बाहर कर दिया।

जब तक धर्म आत्मा नहीं बनेगा
और कर्मकाण्ड साधन नहीं रहेगा,
तब तक भारत इतिहास से नहीं,
अपने ही भ्रम से हारता रहेगा।

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