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आज के धर्म और सनातन धर्म सब बदल सकता धर्म नहीं बदलता है क्योंकि धर्म सत्य है।जो बदल जाय वह धर्म नहीं है । वह पाखंड है।

वेदांत 2.0 न सनातन-विरोधी है,
न गीता–उपनिषद–वेद विरोधी।
यही वेदांत 2.0 के प्रमाण और साक्षी हैं।
वेदांत 2.0 किसी शास्त्र या धर्म से निकला हुआ नहीं है।
यह भीतर से लिखा गया है,
और इसके विचार आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांतों से मेल खाते हैं।
इसीलिए वेदांत 2.0 को अपने विचार पर गर्व है।
वेद, सनातन, उपनिषद, गीता और रामायण से
वेदांत 2.0 पूर्णतः सहमत है।
कबीर, नानक, मीरा, बुद्ध—
किसी भी अतीत के भक्त या बोधपुरुष
भगवान-विरोधी नहीं हैं।
वे विश्व के समस्त दर्शन, शास्त्र
और वर्तमान वैज्ञानिक सिद्धांतों से सहमत हैं।
केवल और केवल आज के बुद्धिजीवी
धार्मिक पाखंड के विरोधी हैं।
आज का पाखंडी धर्म
वेद, गीता, उपनिषद और सनातन से मेल नहीं खाता—
यही समस्या है।
अन्यथा लिखने का कोई अर्थ ही नहीं।
वेदांत बस इतना ही कहता है
कि आज की धार्मिकता
न वेद–उपनिषद–गीता से मेल खाती है,
न आधुनिक विज्ञान से।
यही संकट है।
ओशो राजनीति को दोष देते हैं कि राजनीति घटिया है,
लेकिन मैं राजनीति को दोष नहीं देता।
क्योंकि राजनीति की जननी धर्म है।
यदि धर्म सत्य हो,
तो न मुगल होते,
न अंग्रेज होते,
न आज की गंदी राजनीतिक हवा होती।
राजनीति का धर्म है
अंधकार देखकर उसका साथ बन जाना।
जैसे शेर का धर्म शिकार करना है—
हम शेर को हिंसक नहीं कहते,
उसे शक्ति का प्रतीक कहते हैं।
राजनीति अपना काम करेगी,
शिकार करेगी—
यह उसका धर्म है।
लेकिन धर्म का धर्म राजनीति नहीं है।
जब धर्म स्वयं सत्य पर चलता है,
तो राजनीति अपने आप
सत्य के पीछे दौड़ने लगती है।
तब समाज, शिक्षा, विज्ञान—
सब पवित्र हो जाते हैं।
इसीलिए शास्त्रों में
पहले धर्म,
फिर अर्थ,
फिर काम
और अंत में मोक्ष कहा गया है।
यदि धर्म सत्य हुआ,
तो आगे सब कुछ सत्य, शुभ और पवित्र हो जाता है।
भगवान राम दो के प्रतिनिधि हैं,
कृष्ण चार के प्रतिनिधि हैं।
राम धर्म और कर्तव्य के प्रतिनिधि हैं।
उन्होंने राजनीति भी की,
लेकिन पहले धर्म चुना,
फिर राजनीति में प्रवेश किया।
यदि राम वनवास से इंकार करते,
तो धर्म छूट जाता
और केवल राजनीति बचती।
लेकिन उन्होंने पहले कर्तव्य चुना,
फिर उसी कर्तव्य को राजनीति में निभाया—
इसलिए राम अवतार कहलाए।
कृष्ण धर्म, अर्थ और काम—
तीनों के साथ खड़े हुए।
वे राजा बने,
जहाँ ज़रूरत हुई उपदेश दिया,
जहाँ ज़रूरत हुई हिंसा को भी धर्म बनाया।
काम उनकी लीला बनी,
प्रेम उनका वैश्विक संदेश बना।
लेकिन आज की धार्मिकता
न राम से मेल खाती है,
न कृष्ण से।
आज धर्म
एक ओर राम-कृष्ण की पूजा करता है,
और दूसरी ओर
बलात्कार, चोरी, व्यापार और राजनीति करता है।
कृष्ण जैसे नहीं बनना,
बस उनकी मूर्ति चाहिए,
मंदिर चाहिए,
प्रशंसा चाहिए।
कृष्ण कभी भिखारी बने,
कभी चक्रधारी,
कभी ग्वाला,
कभी रथ चलाने वाले सारथी।
वे हर रंक के साथ खड़े हुए—
लेकिन आज की धार्मिकता
इस सत्य को नहीं अपनाती।
आज पूजा, मंदिर, जय-जयकार
को ही धर्म बना दिया गया है।
मानो राम-कृष्ण आज बूढ़े हो गए हों,
और उनकी सेवा करना ही धर्म हो।
जहाँ भगवान को
धन, सोना, चाँदी, हीरे चाहिए—
ऐसे भगवान और ऐसे धर्म का
मैं बहिष्कार करता हूँ।
जहाँ मूर्ति के दर्शन को
राम-कृष्ण के दर्शन कहा जाए—
उस धर्म का भी मैं बहिष्कार करता हूँ।
यदि राम-कृष्ण
तुम्हारी सुविधाएँ पूरी करने का साधन बन जाएँ,
तो उस भगवान का भी मैं विरोध करता हूँ।
यह धर्म नहीं,
यह अतीत के नाम पर किया गया छल है।
गीता, राम, कृष्ण को
अपनी वासनाओं का औचित्य बना दिया गया है—
यह धर्म नहीं,
यह पूर्ण पाखंड और अंधविश्वास है।
रामायण, महाभारत, वेद, उपनिषद के समय
क्या आज जैसा धर्म था?
महल, सुरक्षा, विशेष विमान,
राजनीतिक समझौते,
मीडिया प्रचार,
कृपा और आशीर्वाद का व्यापार?
आज का कोई भी धार्मिक व्यक्ति
ऋषि–मुनि–संतों से मेल नहीं खाता।
सत्य की बात तो दूर,
आत्मा की बात भी नहीं करता।
आज मंदिर, लंगर,
भव्य मूर्तियाँ,
VIP टिकट—
क्या यही सनातन परंपरा थी?
यदि यही धर्म है,
तो मैं ऐसे धर्म,
ऐसे शास्त्र,
ऐसे भगवान—
सबका बहिष्कार करता हूँ।
धर्म का काम सेवा नहीं है।
धर्म का काम
दान लेना या दान करवाना नहीं है।
धर्म का काम
मानव को जागृत करना है—
कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके।
धर्म का काम
नियम थोपना नहीं,
कर्मकांड बनाना नहीं,
बल्कि विवेक जगाना है।
जब जनता में आत्मा जागृत होगी,
तो समाज, देश, राजनीति,
विज्ञान और व्यापार
स्वतः पवित्र हो जाएंगे—
यही रामराज्य है।
धर्म का काम
मौन रहकर स्वयं उदाहरण बनना है—
बिना भोग, बिना प्रचार,
बिना राजनीति।
जब हर व्यक्ति आत्मवान होगा,
तो न संस्था चाहिए,
न गुरु की भीड़।
आज धर्म राजनीति बन गया है—
कि जितनी दुनिया दुखी होगी,
उतनी हमारी दुकान चलेगी।
यही आज का धर्म है—
और इसी का
वेदांत 2.0 पूर्ण बहिष्कार करता है।

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