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श्राद्ध: श्रद्धा, विज्ञान और प्रकृति-संरक्षण का त्रिवेणी संगम — जिसे ‘अंधविश्वास’ कहकर नज़रअंदाज़ किया गया

✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा / भोपाल /विशेष रिपोर्ट
जब आस्था के नाम पर लाखों पशुओं की कुर्बानी दी जाती है तो उसे “विश्वास” कहा जाता है,
लेकिन जब श्राद्धपक्ष में पशु–पक्षियों को भोजन कराकर प्रकृति और जीवन-चक्र की रक्षा की जाती है, तो वही परंपरा “अंधविश्वास” करार दी जाती है।

यह विरोधाभास केवल धार्मिक नहीं, बल्कि बौद्धिक ईमानदारी का भी प्रश्न है।
श्राद्ध शब्द “श्रद्धा” से बना है—और इसका प्रथम तत्व है पितरों के प्रति सम्मान। विडंबना यह है कि आधुनिक युग में परंपराओं पर प्रश्नचिह्न लगाने वाले लोग अक्सर जीवित माता–पिता के सम्मान पर मौन रहते हैं, जबकि श्राद्ध जैसी परंपराओं को कोसते हैं।

ऋषि-मुनियों की दूरदृष्टि: परंपरा के पीछे विज्ञान: हमारे ऋषि-मुनि केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि प्रकृति-विज्ञान के गहन ज्ञाता थे। श्राद्धपक्ष में कौवों को भोजन कराने की परंपरा को अक्सर उपहास का विषय बनाया जाता है—पर इसके पीछे छिपा वैज्ञानिक और पारिस्थितिक तर्क शायद ही बताया जाता है। प्रश्न उठता है—क्या आपने कभी देखा है कि पीपल या बरगद का पेड़ बीज बोने से उगता हो?
या इन वृक्षों की कलम लगाकर उन्हें उगाया गया हो? उत्तर है—नहीं।

प्रकृति की अद्भुत व्यवस्था: पीपल और बरगद जैसे अत्यंत उपयोगी वृक्षों के बीज कौवे खाते हैं। कौवे के पाचन तंत्र में बीजों की प्राकृतिक प्रोसेसिंग होती है, जिसके बाद ही वे अंकुरण के योग्य बनते हैं। इसके पश्चात जहाँ-जहाँ कौवे विचरण करते हैं, वहीं ये वृक्ष उगते हैं।

• पीपल: चौबीसों घंटे ऑक्सीजन छोड़ने वाला दुर्लभ वृक्ष
• बरगद: औषधीय गुणों से भरपूर, दीर्घायु और छाया देने वाला वृक्ष
इन दोनों वृक्षों का संरक्षण कौवों और पक्षियों के संरक्षण से सीधे जुड़ा है।

श्राद्ध और पारिस्थितिकी का संबंध: भाद्रपद मास में मादा कौआ अंडे देती है और नई पीढ़ी जन्म लेती है। इस समय नवजात पक्षियों को पौष्टिक आहार की आवश्यकता होती है।

ऋषि-मुनियों ने समाज के हर घर की छत को पोषण केंद्र बना दिया—श्राद्ध के माध्यम से। यह परंपरा किसी अंधविश्वास की उपज नहीं, बल्कि प्रकृति-संरक्षण की सामूहिक योजना थी—जिसका लाभ आज भी हमें पीपल और बरगद जैसे वृक्षों के रूप में मिल रहा है।

परंपराओं पर उंगली उठाने से पहले आत्ममंथन: जब दुनिया में आधुनिक सभ्यताओं के नामोनिशान भी नहीं थे, तब सनातन परंपरा में खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, पर्यावरण-संतुलन और जीवन-दर्शन विकसित हो चुका था।

परंपराओं को बिना समझे “पाखंड” कह देना अज्ञान का प्रदर्शन है। आलोचना का अधिकार सबको है—
लेकिन तथ्यों के साथ।

श्राद्ध केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, यह श्रद्धा, विज्ञान और प्रकृति-संरक्षण का समन्वय है। जब भी पीपल या बरगद का वृक्ष देखें—तो केवल छाया नहीं, पूर्वजों की दूरदृष्टि भी याद करें।
परंपराएँ तब तक जीवित रहती हैंजब तक हम उन्हें समझकर निभाते हैं, न कि बिना समझे खारिज करते हैं।

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