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वामपंथ का वो खून सना अध्याय जिसे इतिहास की फाइलों में दफना दिया गया

जब गरीब, दलित और शरणार्थी सत्ता की राजनीति में कुचल दिए गए

✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा / भोपाल

पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र में गंगा की धाराओं—हुगली और पद्मा—के बीच स्थित एक सुनसान, दलदली द्वीप मरीचझापी आज भी भारतीय इतिहास के सबसे भयावह और अनकहे अध्यायों में से एक है। यह वही स्थान है जहाँ वर्ष 1979 में वामपंथी सरकार के शासनकाल में हजारों बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों पर राज्य शक्ति का निर्मम प्रयोग हुआ—एक ऐसा प्रयोग जिसकी तुलना जलियाँवाला बाग जैसे नरसंहारों से की जाती है, लेकिन जिसे राष्ट्रीय स्मृति से लगभग मिटा दिया गया।

उस समय पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री थे ज्योति बसु, जिन्हें आज भी वामपंथी राजनीति के एक “प्रतीक पुरुष” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन मरीचझापी की घटना उनके राजनीतिक जीवन पर लगा वह दाग है, जिस पर न तो कभी सार्वजनिक पश्चाताप हुआ और न ही कोई नैतिक उत्तरदायित्व तय किया गया।

विभाजन की पीड़ा और शरणार्थियों की त्रासदी:भारत का विभाजन केवल भू-राजनीतिक घटना नहीं था, बल्कि मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक था। पूर्वी पाकिस्तान (बाद में बांग्लादेश) में धार्मिक उत्पीड़न के शिकार लाखों हिंदू शरणार्थी वर्षों तक भारत की ओर पलायन करते रहे। इनमें से अधिकांश लोग दलित, अत्यंत गरीब और सामाजिक रूप से वंचित वर्गों से थे।

विडंबना यह रही कि जिन लोगों ने 1946 में भारत के विभाजन के विरोध में मतदान किया था, वही लोग बाद में नागरिकता, पुनर्वास और सुरक्षा से वंचित कर दिए गए। 1971 के युद्ध के बाद आए शरणार्थियों को न तो स्थायी नागरिकता मिली और न ही सम्मानजनक जीवन।

मरीचझापी: उम्मीद से नरसंहार तक: लगभग 40,000 शरणार्थियों ने मरीचझापी द्वीप पर बसकर अपने बल पर जीवन शुरू किया। उन्होंने खेती की, स्कूल खोले, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनाए। यह सब उस पार्टी के शासन में हो रहा था जो खुद को गरीबों, मजदूरों, दलितों और वंचितों की सबसे बड़ी हितैषी बताती थी। लेकिन यही द्वीप जल्द ही “खूनी द्वीप” में बदल दिया गया। सरकारी आदेश पर 100 से अधिक पुलिस जहाजों और स्टीमर के जरिए द्वीप की नाकेबंदी की गई। आवागमन रोका गया, पीने के पानी के स्रोत बंद किए गए, और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जल स्रोतों में जहर तक मिलाया गया। भूख, प्यास और बीमारी से सैकड़ों लोग मरे—जिनमें नवजात बच्चे भी शामिल थे। जो बचने के लिए समुद्र में कूदे, वे डूब गए। कई लोगों को मारकर लाशें समुद्र और जंगलों में फेंक दी गईं। आज भी इस नरसंहार में मारे गए लोगों की संख्या पर कोई आधिकारिक सत्य सामने नहीं आया—सरकारी रिकॉर्ड में केवल दो मौतें, जबकि प्रत्यक्षदर्शी हजार से अधिक मौतों की बात कहते हैं।

राजनीतिक जवाबदेही का अभाव: इतिहास का यह क्रूर सत्य है कि इस घटना के बाद न कोई इस्तीफा हुआ, न कोई गिरफ्तारी, न कोई न्यायिक जांच। इसके उलट, ज्योति बसु भारत के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाकर सत्ता से विदा हुए—बिना किसी सार्वजनिक आत्मालोचना के।

यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है कि यदि यही घटना किसी और राजनीतिक विचारधारा की सरकार के समय हुई होती, तो क्या प्रतिक्रिया इतनी मौन रहती?

वामपंथ और राजनीतिक हिंसा की विरासत:मरीचझापी कोई अलग-थलग घटना नहीं थी। 1977 से 2011 तक के वामपंथी शासनकाल में राजनीतिक हिंसा एक संगठित हथियार के रूप में इस्तेमाल होती रही। सेनबाड़ी हत्याकांड से लेकर बाद के अनेक रक्तरंजित संघर्षों तक, बंगाल की राजनीति में भय एक स्थायी तत्व बन गया। बाद के वर्षों में सत्ता बदली, लेकिन हिंसा की संस्कृति बनी रही। चेहरे बदले, दल बदले, लेकिन कार्यशैली में बदलाव नहीं आया।

सवाल जो आज भी जिंदा हैं:
• क्या गरीब और दलित केवल राजनीति के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द हैं?
• क्या शरणार्थियों की पीड़ा विचारधारा से कमतर होती है?
• क्या सत्ता में रहते हुए की गई क्रूरता इतिहास से मिटाई जा सकती है?
मरीचझापी यह याद दिलाता है कि कोई भी विचारधारा, जब सत्ता के अहंकार में डूब जाती है, तो वह मानवता से दूर चली जाती है।
मरीचझापी नरसंहार केवल अतीत की घटना नहीं है, बल्कि राजनीतिक नैतिकता की कसौटी है। यह घटना बताती है कि जनता को सच्चाई जानने का अधिकार है—चाहे वह कितनी ही असहज क्यों न हो।
इतिहास को दबाया जा सकता है,मिटाया नहीं।
राष्ट्रहित सर्वोपरि।

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