
आज दिनांक 11.01.2026 को विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के तत्वावधान में आयोजित ‘हिन्दी का वर्तमान भारतीय सन्दर्भ और वैश्विक
आज दिनांक 11.01.2026 को विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के तत्वावधान में आयोजित ‘हिन्दी का वर्तमान भारतीय सन्दर्भ और वैश्विक परिप्रेक्ष्य’ विषयक द्वि–दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन विश्वविद्यालय वाणिज्य विभाग के सभागार में कई सत्रों में देश–विदेश के विद्वान वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए। प्रथम सत्र में मंच संचालन डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन तथा द्वितीय सत्र में डॉ.गजेन्द्र भारद्वाज ने किया एवं धन्यवादज्ञापन डॉ.मंजरी खरे ने किया।अंतिम सत्र में देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों तथा शिक्षकों ने अपने शोध–पत्र का वाचन ऑनलाइन तथा ऑफलाइन मोड में किया। संगोष्ठी का समाहार विश्वविद्यालय हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो.उमेश कुमार ने किया। समाहार करते हुए उन्होंने कहा कि प्राचीन समय से हिन्दी अपने विभिन्न रूपों में समाज और राज्याश्रित रही है। इतना ही नहीं वैश्विक स्तर पर इसकी प्रसिद्धि भारतीय संस्कृति के साथ भी अक्षुण्ण है।
प्रथम सत्र के मुख्य अतिथि प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी (दिल्ली विश्वविद्यालय) ने कहा कि जिस देश में भी जागरण, लोकजागरण या नवजागरण हुआ है, वहां की अपनी भाषा में ही हुआ है। नकल की भाषा से आप नवजागरण नहीं ला सकते। हां अपने नवजागरण को समृद्ध कर सकते हैं। भाषा की प्रतिष्ठा का प्रश्न भाषा का नहीं, अर्थव्यवस्था का प्रश्न है। आज लोग कोरियन, जैपनीज जैसी भाषाओं के पीछे इसलिए भाग रहे हैं क्योंकि कोरिया, जापान जैसे देशों की अर्थव्यवस्था मजबूत है। ऐसे में देखें, रुपए की क्या हालत है डॉलर के मुकाबले? जब आप आर्थिक रूप से सम्पन्न होंगे तो लोग सहर्ष आपकी भाषा सीखने आयेंगे। यह भी कि किसी भाषा की ऑथेंटिसिटी से भी भाषा की प्रतिष्ठा बढ़ती है। आपकी भाषा की पत्रकारिता की दुनिया में कितनी विश्वसनीयता है? यहां झूठ बहुत है। अर्थ अपनी गरिमा खोते जा रहे हैं। यह सच है कि हिन्दी समावेशी प्रवृत्ति की है। इसलिए जो समावेशी समाज और सद्भावना के विरुद्ध हैं, वो हमारी भाषा के भी विरुद्ध खड़े हैं।
प्रो.तिवारी ने कहा कि जिस प्रकार संत आंदोलन और बौद्ध आंदोलन से हिन्दी और पाली निकली। आधुनिक काल में दलित आंदोलन से हिन्दी, मराठी जैसी भाषाओं को पुनर्जीवन मिला। दलित आंदोलन ने भाषा को फिर से प्राणवान बनाया। इसलिए आंदोलन के साथ भाषा का गहरा संबंध है। आंदोलन से निकली भाषा दिशा देती है।
प्रथम सत्र के अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो.रविभूषण ने कहा कि भाषा समाज को बनाती है। समाज को नष्ट करेंगे तो भाषा भी नष्ट होगी। भाषा को बचाना अपने को बचाना है, प्रेम को बचाना है, सम्बन्धों को बचाना है, जीवन को बचाना है। वर्तमान समय में भाषा का अंग–भंग किया जा रहा है, भाषा की प्रकृति को नष्ट करने की कोशिश क्यों हो रही है? यह आज हमारी चिंता का विषय होना चाहिए।
वहीं डॉ.राकेश कुमार (दिल्ली विश्वविद्यालय) ने कहा कि हिन्दी ने उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम के क्षेत्रों को समेटते हुए उनके शब्दों को जगह दी। हिंदुस्तान में हिन्दी ने समन्वय बनाते हुए ही अपना विकास किया। यह स्थानीय स्तर की बात हुई। वहीं हिन्दी के वैश्विक विकास में फिजी , सूरीनाम जैसी देशों में गए गिरमिटिया मजदूरों ने तथा पड़ोसी देश जैसे नेपाल, श्रीलंका ने तथा आधुनिक समय में जो रोजगार और अन्य संभावनाओं को लेकर प्रवासन हुआ है, उसकी बहुत बड़ी भूमिका है। विश्व के कई स्कूलों, महाविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। यह कहना उचित होगा कि हिन्दी सरकारी प्रयासों से अधिक मानवीय प्रयासों से हिन्दी बढ़ी है।
वहीं वरिष्ठ हिन्दी सेवी हीरालाल साहनी ने हिन्दी को लेकर तमाम दुराग्रहों को दूर करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
डॉ.धनराज कुमार ने कहा कि आज हिन्दी की वैश्विक उपस्थिति को राजनीति विज्ञान के मध्यम से
सभी क्षेत्रों में अपनी कला का प्रदर्शन कर सभी को हिंदी के मधुरतम रस को पान करवाने का सहयोगी बनना और अपने जीवन सफल बनाने का कोशिश करे l
डॉ.महेश सिन्हा ने कहा कि आज हिन्दी की वैश्विक उपस्थिति को दुनिया के 170 देशों में महसूस किया जा सकता है। लेकिन यह जोड़ना भी सही होगा कि हिन्दी में राष्ट्रकविगण तो हुए लेकिन वह राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी है।
डॉ. बिन्दु चौहान ने कहा कि हिन्दी पर सदियों से विश्वभर में काम हो रहे हैं। हिन्दी नामकरण ही सांस्कृतिक समन्वय का परिणाम है। आज राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केंद्रीय हिन्दी संस्थान, भारतीय भाषा संस्थान, कमीशन फॉर साइंटिफिक एंड टेक्निकल टर्मिनोलॉजी, सीडैक जैसी संस्थाएं हिन्दी के विकास एवं संवर्द्धन में महती भूमिका निभा रही है।
वहीं डॉ.ज्वालाचंद्र चौधरी ने भूमंडलीकरण के बाजार में हिन्दी विषय पर अपनी बात रखी।
मौके पर डॉ. अनुरुद्ध सिंह, डॉ.अखिलेश राठौर, डॉ.धनराज, डॉ.अभिमन्यु राय, श्री विपिन कुमार ठाकुर, वीरेन्द्र दत्ता, असअद आउस, डॉ.धर्मेंद्र दास, डॉ.अभिषेक कुमार सिन्हा, डॉ. शंभू कुमार, डॉ. ज्वालाचंद चौधरी आदि ने भी अपनी बातें रखीं।