
निज़ाम लोहार : पंजाब की धरती का वह बहादुर सपूत, जिसके जनाज़े में 18 हज़ार लोगों ने पैसे देकर भाग लिया
निज़ाम लोहार : पंजाब की धरती का वह बहादुर सपूत, जिसके जनाज़े में 18 हज़ार लोगों ने पैसे देकर भाग लिया
निज़ाम लोहार का जन्म 1835 ई. में अमृतसर के पास स्थित क्षेत्र तरन तारन में हुआ। मूल रूप से निज़ाम एक गरीब लोहार परिवार से संबंध रखता था। उसकी बूढ़ी माँ लोगों के घरों में काम-काज करके अपने बेटे निज़ाम को पढ़ा रही थी। घर में निज़ाम की एक जवान बहन भी थी।
अंग्रेज़ सरकार के अधिकारियों द्वारा गरीब किसानों पर किए जा रहे अत्याचारों को देखकर निज़ाम अक्सर सोच में डूबा रहता कि आम लोगों के साथ जो कुछ हो रहा है, उसकी वजह क्या है। धीरे-धीरे वह अंग्रेज़ों का एक ख़ामोश विरोधी बन गया और शुरू में अपनी ही भट्टी में हथियार बनाने लगा। वह तलवारें, भाले और छुरे बनाकर इकट्ठा करता रहा।
एक रात जब वह कहीं से लौटकर आया तो उसने देखा कि उसकी माँ मर चुकी है और उसकी जवान बहन के कपड़े फटे हुए हैं। पूछने पर बहन ने बताया कि तुम्हारे जाने के बाद अंग्रेज़ पुलिस अफ़सर सिपाहियों के साथ आया था। उसने घर की तलाशी ली और तुम्हारे बनाए हथियार ढूँढ निकाले। माँ को इतनी बेरहमी से मारा गया कि उसकी मौत हो गई। मैंने विरोध करने की कोशिश की तो मुझे भी बुरी तरह पीटा गया।
यह घटना निज़ाम की ज़िंदगी का निर्णायक मोड़ बन गई। उसी रात उसने अपनी बहन को साथ लेकर अपने दोस्त मोहम्मद शफ़ी से उसकी शादी करवा दी और खुद घर-बार छोड़कर एक वीरान हवेली में पनाह ले ली, जो आज भी ककरां वाली हवेली के नाम से जानी जाती है।
अगली रात निज़ाम थाने पहुँचा और उस अंग्रेज़ पुलिस अफ़सर को मार डाला जिसने उसकी माँ का खून किया था और उसकी बहन की बेइज़्ज़ती की थी। इसके बाद वह फ़रार हो गया।
अगली सुबह जब उस अंग्रेज़ पुलिस अफ़सर की हत्या की खबर फैली तो लोग खुशी से झूम उठे, क्योंकि वह अफ़सर औरतों की बेइज़्ज़ती करता था और गरीब किसानों से बेगार करवाता था। लोग अभी इसी खुशी में थे कि सीनियर सुपरिटेंडेंट पुलिस रोनाल्ड की हत्या की खबर भी आ गई। इसके बाद निज़ाम लोहार अंग्रेज़ सरकार के लिए एक बड़ा चैलेंज बन गया और पुलिस उसके पीछे पड़ गई।
इन्हीं दिनों एक दिन निज़ाम की मुलाकात अपने इलाके के मशहूर विद्रोही सूजा सिंह की माँ से हुई, जो रोती-बिलखती जा रही थी। निज़ाम ने कारण पूछा तो उसने बताया कि पुलिस सूजा सिंह को गिरफ्तार करके ले गई है। निज़ाम ने उसे ढाढ़स बंधाया और खुद सूजा सिंह को छुड़ाने के लिए टिब्बा कमाल चिश्ती की ओर चल पड़ा। पुलिस से मुठभेड़ के बाद निज़ाम ने सूजा सिंह को छुड़ा लिया।
इस पर सूजा सिंह की माँ ने निज़ाम लोहार को अपना बेटा बना लिया और वह उसी के पास रहने लगा। इसके बाद निज़ाम लोहार और सूजा सिंह ने मिलकर एक के बाद एक अंग्रेज़ों के चार बड़े अधिकारियों को मार डाला। दोनों ने अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ योजना बनाई और इलाके बाँटकर किसानों को साथ मिलाने के लिए रातों-रात गाँव-गाँव घूमने लगे।
आख़िरकार फैसला हुआ कि मेलों और उर्सों में जाकर अंग्रेज़ पुलिस अधिकारियों को यह कहकर मारा जाएगा कि “पंजाब छोड़कर चले जाओ।” अब निज़ाम लोहार अंग्रेज़ पुलिस के लिए डर का प्रतीक बन चुका था।
इसी दौरान सूजा सिंह की माँ की बीमारी की खबर सुनकर निज़ाम वापस हवेली आ गया। वहाँ पहुँचकर उसे पता चला कि सूजा सिंह पास के गाँव जट्टां दा खोह की एक लड़की छीमा माछन से प्यार करने लगा है। निज़ाम को यह बात पसंद नहीं आई। उसने छीमा माछन को बुलाकर समझाया कि वह सूजा सिंह से प्यार करना छोड़ दे,
क्योंकि प्यार-मोहब्बत इंसान को कायर बना देती है।
इस पर छीमा ने सूजा सिंह को निज़ाम लोहार के खिलाफ भड़का दिया और वह निज़ाम का दुश्मन बन गया। उसने दस हज़ार रुपये और चार मुरब्बा ज़मीन के लालच में थाना भीड़ियाला में खबर दे दी कि निज़ाम लोहार आज हमारे घर होगा और कल वापस काला खोह चला जाएगा।
निज़ाम जिस कमरे में सोया हुआ था, पुलिस ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। कुछ सिपाही छत पर चढ़कर कमरे की छत तोड़ने लगे। निज़ाम को सब समझ आ गया। उसने जमकर मुकाबला किया, लेकिन उसके पास गोलियाँ बहुत कम थीं। जल्द ही वह अंग्रेज़ पुलिस की गोलियों का निशाना बन गया।
यह साल 1877 था। पंजाब के इस बहादुर और दिलेर हीरो के आख़िरी दर्शन के लिए हज़ारों लोग इकट्ठा हो गए। सरकार ने ऐलान कर दिया कि जो मुसलमान निज़ाम के जनाज़े में शामिल होगा, उसे दो रुपये देने होंगे। इस तरह 35 हज़ार रुपये इकट्ठा हो गए।
निज़ाम की क़ब्र पर लोगों ने इतने फूल डाले कि वह फूलों का पहाड़ बन गई। निज़ाम को क़सूर शहर के बड़े कब्रिस्तान में दफन किया गया।
जब सूजा सिंह की माँ को पता चला कि उसके बेटे ने मुखबिरी करके निज़ाम लोहार को मरवाया है, तो उस माँ ने खुद अपने हाथों से सूजा सिंह को भाले से मार डाला और कहा:
“मैं तुझे कभी अपना दूध माफ़ नहीं करूँगी। तूने निज़ाम की मुखबिरी करके पंजाब से ग़द्दारी की है।”
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