
दीपनारायण सिंह यादव उर्फ दीपक पूर्व विधायक गरौठा पर आरोपों की सरकार और प्रशासन की पटकथा
₹15 हज़ार की ‘महान’ बरामदगी और लगभग 500 करोड़ का मौन
उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन इन दिनों एक अजीब किस्म के न्याय-नाटक का मंचन कर रहे हैं। पात्र वही पुराने हैं,पटकथा भी जानी-पहचानी,बस हर बार दृश्य थोड़ा और हास्यास्पद होता जा रहा है।
दीपनारायण यादव—जिनके नाम के आगे 60 मुकदमे गिनाए जा रहे हैं। लूट, अपहरण, छिनैती, मारपीट, गैंगस्टर…सूची इतनी लंबी कि आम आदमी की सांस फूल जाए। सरकार दावा करती है कि उनकी लगभग 500 करोड़ की संपत्ति जब्त की गई।
और फिर, उसी सरकार की पुलिस 8 घंटे की रिमांड में इतिहास रचते हुए 32 हज़ार की लूट में से 15 हज़ार रुपये बरामद कर लेती है।
वाह! यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है।
लगभग 500 करोड़ की संपत्ति पर बुलडोज़र चलाने वाली व्यवस्था जब 15 हज़ार रुपये हाथ में लेकर सीना तानकर खड़ी होती है, तो जनता को समझ जाना चाहिए—यह सिर्फ़ कानून नहीं, तमाशा है।
पुलिस 8 घंटे तक दीप नारायण को गाँव-गाँव घुमाती रही। शायद यह रिकवरी नहीं, बल्कि प्रदर्शन यात्रा थी—ताकि जनता देख सके कि अपराध पर कितनी सख़्ती है।
अपराध कितना बड़ा है, इससे ज़्यादा ज़रूरी यह दिखाना है कि पुलिस कितनी सक्रिय है।
15 हज़ार रुपये बरामद हुए, कैमरे चमके, बयान आए, और फिर…
दीपनारायण यादव वापस जेल,मामला ख़त्म?
नहीं...संदेश पूरा हुआ।
यह वही पैटर्न है,वही तरीका,जो पहले आज़म ख़ान के साथ देखा गया।
मुकदमों की बारिश,मीडिया ट्रायल,संपत्ति के आंकड़े,और फिर सालों तक चलने वाला सन्नाटा।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव इस बात को खुलकर कह चुके हैं, लेकिन सवाल यह है—क्या जनता अब भी इसे नहीं देख पा रही?
आज सवाल दीपनारायण यादव का नहीं है..सवाल उस आम नागरिक का है,जो सोचता है कि अगर किसी नेता के साथ यह हो सकता है, तो उसके साथ क्या होगा?
जिस व्यवस्था में 15 हज़ार की बरामदगी को इतनी बड़ी जीत बताया जाए, वहाँ असली लुटेरा कौन है—यह पूछना ज़रूरी हो जाता है।
#नोट-यह लेख किसी अपराध का बचाव नहीं है..यह उस चयनात्मक न्याय पर व्यंग्य है,उस राजनीतिक बदले पर कटाक्ष है,
और उस जनता की पीड़ा की आवाज़ है,जिसे हर बार तमाशा दिखाकर चुप करा दिया जाता है।
आज 15 हज़ार की बरामदगी पर तालियाँ बज रही हैं।
कल शायद 500 रुपये पर भी प्रेस कॉन्फ्रेंस होगी।
और जनता? वह फिर पूछेगी—न्याय कब मिलेगा, या सिर्फ़ ड्रामा ही चलता रहेगा?