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विकास या विनाश? जल–जंगल–जमीन के नाम पर छत्तीसगढ़ में आदिवासी समाज का बढ़ता आक्रोश”

AIMA न्यूज़ | विशेष रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ विकास के नाम पर जल, जंगल और जमीन सबसे बड़े सवाल बन चुके हैं। बस्तर से लेकर रायगढ़, कोरबा और अरावली जैसे क्षेत्रों तक आदिवासी समाज और आम जनता सड़कों पर है। विरोध की आवाज़ एक जैसी है—
👉 विकास हो, लेकिन विनाश नहीं।
राज्य के कई हिस्सों में कोयला खनन और बड़े कॉरपोरेट प्रोजेक्ट्स के लिए जंगलों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है। हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं, लेकिन बदले में न तो स्थायी रोजगार, न स्थानीय सहमति, और न ही पर्यावरण की ठोस सुरक्षा दिखती है। सवाल यह भी उठ रहा है कि
क्या यह सब केवल एक बड़े उद्योग समूह को लाभ पहुंचाने के लिए किया जा रहा है?
✊ आदिवासी समाज की पीड़ा
आदिवासी समाज के लिए जंगल केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि
🌱 जीवन,
💧 जल,
🛖 संस्कृति और पहचान है।
जब जंगल कटता है, तो सिर्फ पेड़ नहीं गिरते—
पूरा जीवन तंत्र टूटता है।
लोगों को जबन विस्थापित किया जाता है, मुआवज़ा अधूरा होता है, और पुनर्वास सिर्फ कागज़ों में सिमट कर रह जाता है।
❓ सरकार से सवाल
क्या विकास का मतलब पेड़ों की बलि ही है?
क्या बिना जंगल काटे, बिना लोगों को हटाए वैकल्पिक विकास मॉडल संभव नहीं?
ग्रामसभा की सहमति को क्यों नजरअंदाज किया जा रहा है?
क्या आदिवासियों की आवाज़, कॉरपोरेट हितों से कमतर है?
🌍 समाधान की राह
जनता की मांग साफ है—
✔️ विकास हो, लेकिन पर्यावरण और मानव अधिकारों के साथ
✔️ स्थानीय लोगों की सहमति अनिवार्य हो
✔️ विस्थापन नहीं, स्थानीय रोजगार दिया जाए
✔️ जंगल बचाकर हरित विकास मॉडल अपनाया जाए
🔔 AIMA न्यूज़ की अपील
यह सिर्फ आदिवासियों की लड़ाई नहीं,
यह छत्तीसगढ़ के भविष्य की लड़ाई है।
अगर आज जंगल नहीं बचे, तो कल जीवन नहीं बचेगा।
सरकार से अपील है कि वह जनता की आवाज़ सुने,
विकास और विनाश के फर्क को समझे,
और ऐसा निर्णय ले जिससे छत्तीसगढ़ बचे—
जल भी, जंगल भी और जमीन भी।
✍️ AIMA न्यूज़ | जनता की आवाज़

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