logo

धर्म–अर्थ–काम–मोक्ष : एक जीवन-बोध अज्ञात अज्ञानी वेदान्त 2.0 (एक समग्र दार्शनिक दृष्टि)

धर्म–अर्थ–काम–मोक्ष : एक जीवन-बोध

मोक्ष कोई साध्य नहीं है।
मोक्ष कोई लक्ष्य नहीं है।
मोक्ष कोई उपलब्धि नहीं है।
मोक्ष धर्म, अर्थ और काम को जी लेने का परिणाम है।
जिसे पाया जा सके, वह मोक्ष नहीं।
जिसे साधना से पकड़ा जा सके, वह मोक्ष नहीं।
मोक्ष ठीक उसी तरह है जैसे मृत्यु—
न चाहो तब भी घटती है,
और चाहो तो भी तुम्हारे बस में नहीं।

मोक्ष : प्रयास नहीं, फल
जब जीवन पूरा जिया जाता है,
तो मोक्ष स्वतः फलित होता है।
जैसे—
दीपक जलाओ,
अंधकार हट जाता है।
अंधकार हटाने का कोई अलग प्रयास नहीं करना पड़ता।
प्रकाश कोई कर्म नहीं—
वह दीपक जलने का परिणाम है।
वैसे ही—
जीवन को सही ढंग से जिया जाए,
तो मोक्ष कोई साधना नहीं,
जीवन की रोशनी है।

अर्थ और काम : जड़ हैं, फिर भी आवश्यक
अर्थ आवश्यकता है।
काम आनंद है, प्रेम है, सुख है।
आवश्यकता आनंद नहीं होती

आनंद आवश्यकता नहीं होता

अर्थ बिना काम के सूखा है।
काम बिना अर्थ के अस्थिर है।
दोनों जड़ हैं—
पर जीवन के लिए अनिवार्य हैं।

धर्म : न अर्थ है, न काम
धर्म न अर्थ है,
न काम है,
न मोक्ष है।
धर्म है—
काम और अर्थ के बीच का सेतु।
यदि यह सेतु श्रेष्ठ है—
तो अर्थ भी दिव्य बनता है,
काम भी पवित्र हो जाता है,
और मोक्ष अपने आप खिलता है।
यदि यह सेतु नहीं है—
तो अर्थ अंधा है,
काम अंधा है,
और मोक्ष की बात केवल छल है।

धर्म कोई वस्तु नहीं, बोध है
धर्म छूने की चीज़ नहीं है।
काम को छू सकते हो।
अर्थ को छू सकते हो।
धर्म अदृश्य है।
धर्म गुण है।
धर्म स्वभाव है।
धर्म विवेक है।
काम और अर्थ जन्म से पहले भी थे।
धर्म को पैदा करना पड़ता है—
बोध से, समझ से, जागरूकता से।
इसलिए—
धर्म शिक्षा है,
धर्म समझ है,
धर्म संतुलन है।

धर्म = संबंध, बिना स्वार्थ
धर्म वह संबंध है—
जिसमें कोई लाभ नहीं,
कोई सौदा नहीं,
कोई अपेक्षा नहीं।
धर्म कहता है—
“मैं तुम्हारा अर्थ नहीं चाहता,
मैं तुम्हारा काम नहीं चाहता,
मुझे पूजा नहीं चाहिए,
धन्यवाद नहीं चाहिए।
तुम्हारा सुख,
तुम्हारा प्रेम,
तुम्हारी संतुष्टि—
वही मेरी संतुष्टि है।”
यही संतुष्टि मोक्ष है।
यही मानव होने का सत्य है।

धर्म : पृथ्वी के चुंबक की तरह
धरती का चुंबक दिखता नहीं,
पर वही संतुलन बनाए रखता है।
धर्म भी ऐसा ही है—
अदृश्य,
निशब्द,
पर जीवन को बिखरने से बचाने वाला।

आज का सबसे बड़ा अनर्थ
आज—
अर्थ और काम को ही
धर्म का नाम दे दिया गया है।
पद, प्रतिष्ठा, धन, नाम—
इन्हें धर्म कह दिया गया।
जब सेतु खुद ही
यात्री बन जाए,
तो सभ्यता को
दीमक लग जाती है।
सेतु मार्गदर्शन के लिए होता है।
यदि सेतु ही लक्ष्य बन जाए—
तो वही पाखंड है।
आज यही हो रहा है—
और इसी अनर्थ को
धर्म कहा जा रहा है।

***************

धर्म–अर्थ–काम–मोक्ष
(एक समग्र दार्शनिक दृष्टि)

1. मोक्ष: साध्य नहीं, जीवन का स्वाभाविक फल
मोक्ष कोई लक्ष्य नहीं है जिसे साधा जाए।
मोक्ष कोई अवस्था नहीं है जिसे प्रयास से पकड़ा जाए।
मोक्ष धर्म, अर्थ और काम को पूर्णता से जी लेने का परिणाम है।
जिस तरह—
मृत्यु जीवन का अनिवार्य फल है

उसी तरह मोक्ष जीवन की पूर्णता का फल है

दीपक–प्रकाश की उपमा यहाँ अत्यंत सटीक है:
दीपक जलाना कर्म है,
अंधकार हटाना प्रक्रिया है,
पर प्रकाश कोई अलग प्रयास नहीं—
वह स्वतः घटता है।
वैसे ही—
धर्मपूर्वक जिया गया जीवन
मोक्ष को उत्पन्न नहीं करता,
मोक्ष को प्रकट कर देता है।

2. अर्थ और काम: जड़, पर अनिवार्य
अर्थ = आवश्यकता, साधन
काम = आनंद, प्रेम, सुख
दोनों जड़ हैं—
पर जीवन से अलग नहीं किए जा सकते।
आवश्यकता आनंद नहीं है

आनंद आवश्यकता नहीं है

अर्थ बिना काम के नीरस है।
काम बिना अर्थ के असंतुलित।
समस्या अर्थ और काम में नहीं है—
समस्या इनके अंधेपन में है।

3. धर्म: काम और अर्थ के बीच अदृश्य सेतु
धर्म न अर्थ है,
न काम है,
न मोक्ष है।
धर्म काम और अर्थ के बीच का विवेकपूर्ण संबंध है।
यदि यह सेतु सशक्त है—
अर्थ लोभ नहीं बनता

काम वासना नहीं बनता

और मोक्ष अपने आप घटित होता है

यदि यह सेतु नहीं है—
अर्थ संग्रह बन जाता है

काम उपभोग बन जाता है

और मोक्ष एक झूठा सपना।

इसलिए—
मोक्ष की असंभवता का कारण
धर्म की अनुपस्थिति है।

4. धर्म: वस्तु नहीं, बोध
काम को छुआ जा सकता है।

अर्थ को संग्रहित किया जा सकता है।
धर्म को न छुआ जा सकता है, न दिखाया जा सकता है।
धर्म—
गुण है

स्वभाव है

विवेक है

जैसे पृथ्वी का चुंबक—
दिखता नहीं,
पर संतुलन बनाए रखता है।
धर्म जन्म से नहीं मिलता।
धर्म विकसित करना पड़ता है—
बोध से, समझ से, जागरूकता से।

5. धर्म का वास्तविक अर्थ: बिना अपेक्षा का संबंध
सच्चा धर्म कहता है—
“मैं तुम्हारे अर्थ का इच्छुक नहीं हूँ।
मैं तुम्हारे काम का उपभोक्ता नहीं हूँ।
मुझे पूजा नहीं चाहिए,
धन्यवाद नहीं चाहिए।
तुम्हारा सुख,
तुम्हारा प्रेम,
तुम्हारी संतुष्टि—
वही मेरी संतुष्टि है।”
यही संतुष्टि मोक्ष है।
यही मानव होने की पूर्णता है।

6. आज का अनर्थ: जब सेतु ही लक्ष्य बन जाए
आज—
अर्थ और काम को
धर्म का नाम दे दिया गया है।
धन, पद, प्रसिद्धि, पहचान—
इन पर धर्म का मुखौटा चढ़ा दिया गया।
जब सेतु स्वयं यात्री बन जाए,
तो सभ्यता को दीमक लग जाती है।
धर्म का काम मार्गदर्शन है।
यदि वही मार्ग बन जाए—
तो वही पाखंड है।
और यही पाखंड
आज “विकास” कहलाता है।

निष्कर्ष (वेदांत 2.0 का सार)
मोक्ष साधना नहीं, परिणाम है

धर्म नियम नहीं, बोध है

अर्थ समस्या नहीं, अंधापन है

काम दोष नहीं, असंतुलन है

और—
जीवन को सही ढंग से जी लेना ही
मोक्ष की एकमात्र संभावना है।

***********

रज–तम–सत : धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल सूत्र
अर्थ और काम —

दोनों तम और रज के क्षेत्र हैं।
तम = जड़ता, स्थिरता, आधार
रज = गति, विस्तार, क्रिया
इन्हीं दोनों से संसार चलता है।
इन्हीं से जीवन की यात्रा होती है।

पर—
धर्म सत है।
और मोक्ष तीनों का विलय है।
सत : मूल आधार
सत ही आधार है।
रज और तम उसी पर खड़े हैं।
रज और तम अलग नहीं हैं—
वे सत की ही अवस्थाएँ हैं।
जैसे—
नींद और जागरण अलग दिखते हैं
पर चेतना एक ही रहती है
वैसे ही— तम और रज में भी सत विद्यमान है,
बस उसकी मात्रा कम–ज़्यादा है।
धर्म : तीसरा पक्ष नहीं, बोध
धर्म कोई तीसरा तत्व नहीं।
धर्म सत का बोध है।
धर्म जागरण है।
धर्म आँख है।
जब धर्म नहीं होता—
रज और तम लड़ते हैं
विस्तार होता है
विकास होता है
पर बोध नहीं होता
जितना विस्तार,
उतना बोध — यह आवश्यक नहीं।
क्योंकि
बोध विस्तार नहीं, जीवन है।
रज–तम की यात्रा और सत की उपस्थिति
रज और तम की यात्रा चलती रहती है—
सृष्टि में, समाज में, मनुष्य में।
पंचतत्व भी
सत से ही उत्पन्न हुए हैं।
इसलिए—
पत्थर में भी सत है
जीव में भी सत है
फर्क केवल संवेदना का है।
फर्क केवल जागरण का है।
जब सत का बोध जागता है
जब धर्म — अर्थात सत का बोध — जागता है, तो—
तम, तम नहीं रहता
रज, रज नहीं रहता
दोनों सत में रूपांतरित हो जाते हैं।
तब—
काम वासना नहीं रहता
अर्थ संग्रह नहीं रहता
वे जीवन के साधन बन जाते हैं।
मोक्ष : तीनों का विलय
मोक्ष रज का नाश नहीं है।
मोक्ष तम का त्याग नहीं है।
मोक्ष सत की प्राप्ति भी नहीं है।
मोक्ष = रज + तम + सत का विलय।
जहाँ—
जड़ता भी सचेत है
गति भी सचेत है
और बोध स्थिर है
यही पूर्णता है।
यही जीवन का शिखर है।
अंतिम सूत्र
पत्थर और बुद्ध में अंतर पदार्थ का नहीं,
जागरण का है।
संसार और मोक्ष में अंतर स्थान का नहीं,
बोध का है।

76
6391 views