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वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज बंद होने पर जश्न, देश की सोच पर सवाल

सूत्र
हाल ही में वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज को लेकर सामने आए घटनाक्रम ने देशभर में बहस छेड़ दी है। कॉलेज के बंद होने की खबर पर कुछ वर्गों द्वारा यह कहकर खुशी जताना कि वहां पढ़ने वाले अधिकतर छात्र मुस्लिम थे, 50 मेडिकल छात्र मे से 42 मुस्लिम छात्र पास हुए थे, इसी लिए मेडिकल कॉलेज बंद कर दिया गया, यह नफरत की
एक खतरनाक और चिंताजनक सोच को उजागर करता है। शिक्षा जैसे पवित्र क्षेत्र को मजहबी चश्मे से देखना न सिर्फ संविधान की भावना के खिलाफ है, बल्कि समाज को बांटने वाला कदम भी है।
जानकारों का कहना है कि मेडिकल कॉलेज का मकसद योग्य डॉक्टर तैयार करना होता है, न कि छात्रों की धार्मिक पहचान देखना। लेकिन इस पूरे मामले में मेरिट को नजरअंदाज कर शिक्षा को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश साफ दिखाई देती है। यह रवैया धीरे धीरे नफरत को सामान्य बना रहा है, जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
भारत की परंपरा हमेशा सेवा और इंसानियत की रही है। अस्पतालों के नाम हिंदू संतों पर हैं, गुरुद्वारे रोज लाखों लोगों को बिना धर्म पूछे खाना खिलाते हैं, दरगाहों पर हर मजहब के लोग दुआ मांगते हैं। इस देश ने कभी इलाज, शिक्षा या सेवा के वक्त धर्म नहीं पूछा। यही भारत की असली पहचान है।
बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि शिक्षा को धार्मिक युद्ध का मैदान बनाना राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि नैतिक पतन है। अगर आज मेडिकल कॉलेज बंद होने पर धर्म के आधार पर खुशी मनाई जाएगी, तो कल इसका असर पूरे शिक्षा तंत्र पर पड़ेगा।
यह समय जश्न का नहीं, आत्ममंथन का है। सवाल यह है कि क्या हम एक ऐसा भारत चाहते हैं जहां डॉक्टर बनने से पहले मजहब देखा जाए, या फिर ऐसा भारत जहां काबिलियत और इंसानियत सबसे ऊपर हो।

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