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विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ!😊🙏

विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ!😊🙏

मेरी मातृभाषा संस्कृत है, लेकिन मेरे मन की भाषा हिन्दी ही है। मैं इसी भाषा में सोचती हूँ, इसी भाषा में लिखती हूँ और इसी भाषा में सबसे सहज रहती हूँ। इसी भाषा के कारण मेरा करियर बना और इसी भाषा के कारण मुझे पहचान मिली। इसी भाषा ने मुझे विश्व-भर में घूमने और नए अनुभव जानने में सक्षम बनाया। इस भाषा ने मुझे इतना कुछ दिया है कि मैं हिन्दी को आगे बढ़ाने में पूरा जीवन भी लगा दूँ, तो भी उसका ऋण नहीं चुका सकती ।

मैंने ऐसे कई हिन्दी भाषी देखे हैं, जो अपनी मातृभाषा हिन्दी न बोल पाना गर्व की बात समझते हैं और इसे उपलब्धि की तरह सबको बताते फिरते हैं। मैंने अंग्रेजी की गुलामी करने वाले और हिन्दी से अत्यधिक घृणा करने वाले भारतीय भी देखे हैं। उन पर मुझे बहुत तरस आता है। लेकिन दूसरी ओर, मैंने हिन्दी का अत्यधिक दुराग्रह करने वाले और अंग्रेज़ी को नाहक अपमानित करने वाले लोग भी देखे हैं।

मेरा सुझाव है कि आप इनमें से किसी भी श्रेणी में मत उलझिए।

हिन्दी हो, अंग्रेज़ी हो या भारत की कोई भी अन्य भाषा हो, सबका अपना-अपना महत्व है।

मेरी तो राय है कि अगर आपकी मातृभाषा हिन्दी है, तो इसे अवश्य सीखिए और कम से कम एक और भारतीय भाषा भी थोड़ी-बहुत सीखने का प्रयास कीजिए। अगर हिन्दी आपकी मातृभाषा नहीं है, तो अपनी मातृभाषा बहुत अच्छी तरह सीखिए, और थोड़ी-बहुत हिन्दी सीखने का भी प्रयास कीजिए। जितनी भाषाएँ जानेंगे, उनसे आपको कुछ न कुछ लाभ ही होगा। कोई भाषा किसी दूसरी भाषा के लिए खतरा नहीं है, बल्कि किसी भी एक भाषा को दूसरी से श्रेष्ठ मानने की भूल हम सबके लिए एक बड़ा खतरा है।

अंग्रेज़ी भाषा भी उपयोगी है, इसलिए उसे अवश्य सीखिए; लेकिन इस बात को भी समझिये कि अंग्रेज़ी केवल एक संपर्क भाषा है। उसे ज्ञान की एकमात्र भाषा समझने की गलती मत कीजिए।

अंग्रेज़ी जैसी सरल भाषा सीख लेना कोई ऐसी महान उपलब्धि नहीं है कि ज़िन्दगी भर इस बात का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाए। इसलिए अंग्रेज़ी जानने के कारण हिन्दी को तुच्छ मत समझिये और हिन्दी के उत्साह में अंग्रेज़ी से भी घृणा मत कीजिए।

मैं अपने अनुभव से कह सकती हूँ कि भाषा सीखना कोई ऐसी बड़ी उपलब्धि नहीं है कि उसका ढिंढोरा पीटा जाए। लेकिन अपने अनुभव से ही मैं यह भी कहती हूँ कि हर भाषा सीखने का कुछ न कुछ लाभ है, इसलिए यह भी मत सोचिये कि केवल अंग्रेज़ी जान लेना काफी है और बाकी सब भाषाएँ बेकार हैं।

लोग अक्सर हर बात के लिए केवल राजनीति और राजनेताओं को दोषी मान लेते हैं। जबकि वास्तव में अधिकांश लोगों ने स्वयं ही अपनी सोच का दायरा इतना छोटा कर लिया है कि अपनी भाषा, अपना प्रांत, अपनी जाति और अपनी पसंद-नापसंद से जो भी अलग हो, उसे बिल्कुल बेकार या तुच्छ समझते हैं। यह केवल अज्ञान और क्षुद्रता का लक्षण है। आप कृपया ऐसे न बनें और अपने बच्चों को भी ऐसा न बनाएँ।
सादर!🙏
लेखिका :- नीलम "नीलू ओझा"

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