
जब माली ही लूट में जुट जाए…
✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा / भोपाल
मध्यप्रदेश में विकास नहीं, उद्घाटन घोटाला चल रहा है!
“उस बग़ीचे में फूल खिलें भी तो क्यों,जिस बग़ीचे के माली की नीयत कलियों पर फिसल गई हो…”
आज यह पंक्तियाँ कोई कविता नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश की राजनीतिक सच्चाई बन चुकी हैं। प्रदेश में विकास के नाम पर जो चल रहा है, वह विकास नहीं बल्कि संगठित लूट और सुनियोजित धोखा है।
20 दिसंबर 2025 को जिस भोपाल मेट्रो का ढोल-नगाड़ों, पोस्टरों और प्रचार के शोर के साथ उद्घाटन किया गया, वह मेट्रो आज जनता को दिखाई तक नहीं देती। कारण साफ़ है—
👉 मेट्रो अधूरी है
👉 दोनों ट्रैक पूरे नहीं हैं
👉 स्टेशन अधकचरे हैं
तो फिर उद्घाटन किस बात का था? जनता के लिए या कैमरों के लिए?
जिन थोड़े-से रूटों पर मेट्रो को “चालू” बताया जा रहा है, वे पूरी तरह बेमतलब हैं। सच यह है कि जिस समय यात्री मेट्रो स्टेशन पहुँचेगा, टिकट लेगा और ट्रेन का इंतज़ार करेगा, उतने समय में वह बाइक या कार से अपने गंतव्य तक पहले ही पहुँच जाएगा।
ऐसी मेट्रो सुविधा नहीं, जनता की बुद्धि का अपमान है।
सालों की मेहनत और हज़ारों करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी मेट्रो जिंसी से एम्स तक ही घिसटती नज़र आ रही है। काम की रफ्तार देखकर साफ़ लगता है कि इसे पूरी तरह चालू होने में अभी 15–20 साल और लगेंगे—अगर तब तक कोई नया उद्घाटन बाकी रहा तो!
यह परियोजना अब इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं, इनऑगरेशन स्कैम बन चुकी है—काम अधूरा, लेकिन उद्घाटन पूरा!
प्रदेश में रोज़ नई घोषणाएँ होती हैं—कभी यह योजना, कभी वह योजना—लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि विकास शून्य है और प्रचार अनंत।
मुख्यमंत्री महोदय रोज़ गौ-माता के नाम पर भाषण और घोषणाएँ करते नहीं थकते, लेकिन सच्चाई यह है कि मध्यप्रदेश में हर दिन गायें या तो कट रही हैं या सड़कों पर तड़प-तड़प कर मर रही हैं।
क्या यही है “संवेदनशील सरकार”?क्या यही है “गौ-रक्षा”?आज प्रदेश पूछ रहा है—
🔴 उद्घाटन किसके लिए हो रहे हैं?
🔴 पैसा किसका लग रहा है?
🔴 ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
अगर अधूरे प्रोजेक्ट पर फीता काटना ही विकास है,तो फिर ईमानदारी इस सरकार की सबसे अधूरी परियोजना है।