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हिमाचल प्रदेश के कर्मचारी: हताशा और लाचारी..

हिमाचल प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों की हताशा: उपेक्षा, असंतोष और राज्य के भविष्य का प्रश्न

हिमाचल प्रदेश, जिसे देवभूमि कहा जाता है, अपनी ईमानदार प्रशासनिक व्यवस्था और अनुशासित सरकारी ढांचे के लिए जाना जाता रहा है। किंतु विडंबना यह है कि आज वही राज्य अपने ही सरकारी कर्मचारियों की उपेक्षा के कारण एक गहरे असंतोष और हताशा के दौर से गुजर रहा है। वर्षों से लंबित एरियर, महंगाई भत्ते (डीए) की किश्तों का भुगतान न हो पाना और बार-बार दिए गए आश्वासनों का खोखला सिद्ध होना न केवल कर्मचारियों को बल्कि राज्य की प्रशासनिक संवेदनशीलता को भी कठघरे में खड़ा करता है।
सरकारी कर्मचारी केवल वेतनभोगी वर्ग नहीं होते, बल्कि वे राज्य की रीढ़ होते हैं। शिक्षक भावी पीढ़ी का निर्माण करते हैं, स्वास्थ्यकर्मी जन-जीवन की रक्षा करते हैं, पुलिस और प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखते हैं, और तकनीकी व लिपिक वर्ग सरकारी योजनाओं को धरातल पर उतारता है। ऐसे में जब यही वर्ग आर्थिक अनिश्चितता, मानसिक तनाव और भविष्य की चिंता से जूझ रहा हो, तो यह राज्य के समग्र विकास के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
महंगाई भत्ता कर्मचारियों के लिए कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि बढ़ती महंगाई के बीच जीवन यापन का एक आवश्यक सहारा है। वर्षों तक डीए की किश्तें न देना यह दर्शाता है कि सरकार जमीनी सच्चाइयों से कितनी दूर हो चुकी है। रसोई का खर्च, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास—सब कुछ महंगा होता जा रहा है, लेकिन कर्मचारी की आय वहीं ठहरी हुई है। यह स्थिति स्वाभाविक रूप से कुंठा और निराशा को जन्म देती है।
राज्य में विभिन्न कर्मचारी संगठन लगातार अपनी मांगों को लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से उठाते रहे हैं। ज्ञापन दिए गए, संवाद की पहल हुई, प्रेस के माध्यम से अपनी पीड़ा रखी गई। किंतु दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन आवाज़ों को या तो अनदेखा किया गया या केवल औपचारिक आश्वासनों तक सीमित रखा गया। प्रेस में प्रकाशित विचार, चेतावनियाँ और सुझाव यदि सरकार के निर्णयों को प्रभावित नहीं करते, तो यह सरकार की संवादहीनता और हीनभावना को उजागर करता है।

एक ऐसा भी दौर हुआ करता था कि राज्य के महत्वपूर्ण दिवसों पर कर्मचारियों को उम्मीद जगती थी कि हिमाचल दिवस,पूर्ण राज्यत्व दिवस,स्वतंत्रता दिवस पर सरकारी कर्मचारियों के लिए अवश्य ही कोई घोषणा होगी, और निस्संदेह होती भी थी,जिससे कर्मचारियों में अपने उतरदायित्व़ के प्रति उत्साह बना रहता था.परंतु विगत वर्षों से न जाने सरकार के पास ऐसे कारण उत्पन्न हो गए हैं कि व्यवस्था की रीढ़ समझे जाने वाले कर्मचारियों की घोर अनदेखी की जा रही है..
यह हीनभावना केवल आर्थिक असमर्थता की नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति की कमी की भी प्रतीक है। जब सरकार अपने ही कर्मचारियों को बोझ समझने लगे, तो यह मानसिकता लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। कर्मचारी सरकार के विरोधी नहीं, बल्कि उसके सबसे बड़े सहयोगी होते हैं। उन्हें नजरअंदाज करना, उनकी जायज मांगों को टालना और असंतोष को बढ़ने देना प्रशासनिक अदूरदर्शिता का संकेत है।
आज आवश्यकता है कि सरकार स्थिति की गंभीरता को समझे। कर्मचारियों की मांगों को वित्तीय संकट का बहाना बनाकर टालना समाधान नहीं है। पारदर्शी संवाद, स्पष्ट समय-सीमा और ठोस कार्ययोजना ही विश्वास बहाल कर सकती है। यदि कर्मचारी संतुष्ट होंगे तो प्रशासन मजबूत होगा, और यदि प्रशासन मजबूत होगा तो राज्य का विकास स्वतः सुनिश्चित होगा।
अंततः प्रश्न केवल एरियर या डीए का नहीं है, प्रश्न सम्मान, विश्वास और साझेदारी का है। हिमाचल प्रदेश का भविष्य तभी सुरक्षित और उज्ज्वल हो सकता है जब उसका कर्मचारी वर्ग मानसिक और आर्थिक रूप से सशक्त होगा। सरकार को यह समझना होगा कि उपेक्षा से नहीं, बल्कि सहभागिता से ही सुशासन संभव है।

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