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युवाओं के प्रेरणास्त्रोत स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।

युवाओं के प्रेरणास्त्रोत स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।

स्वामी विवेकानंद जी जिनका बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था, गुरु, रामकृष्ण परमहंस से भेंट हुई और वे उनके शिष्य बन गए । स्वामी विवेकानंद जी ने 1893 के शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में वेदांत और भारतीय दर्शन का परिचय कराया, रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, और राष्ट्रवाद व मानवतावाद पर अपने विचारों से भारत को नई दिशा दी; वे एक प्रखर वक्ता और दार्शनिक थे, जिन्होंने भारतीय संस्कृति की गरिमा विश्वभर में फैलाई और 39 वर्ष की अल्पायु में 4 जुलाई, 1902 को परलोक सिधारे।

देश की संस्कृति व गौरव को विश्व में स्थापित करने वाले प्रवासी भारतीयों को प्रवासी भारतीय दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।

विश्व कोरियोग्राफी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
आइए, नृत्य कला के महत्व और उसे आकार देने वाले कलाकारों के योगदान को सम्मान दें ।

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हमें अपने स्वरूप में स्थित होना होगा, अर्थात् स्वरूप-सिद्धि। स्वरूप सिद्धि का अर्थ है भगवान् की सेवा में संलग्न होना। वह सच्ची मुक्ति है।

(श्रील प्रभुपाद,मुम्बई, 9 जनवरी 1973 )
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इस्कॉन® कुलाई, मैंगलोर,भक्ति शास्त्री कोर्स के दौरान हमने ईश्वर की उपस्थिति और आत्मिक परिवर्तन में उनकी भूमिका पर विचार किया। जब हम सच्चे मन से पवित्रता और आंतरिक परिवर्तन की कामना करते हैं, तो ईश्वर हमें एक अत्यंत सरल और व्यावहारिक मार्ग बताते हैं—मन को उनसे जोड़कर रखना (मनमनाभव)।

https://aimamedia.org/newsdetails.aspx?nid=496696&y=1

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ज्योतिष शास्त्र, भौतिकवाद से संबंधित लोगों के लिए होता है। उसका ब्रह्मवादी/ आध्यात्मिक लोगों के जीवन में कोई स्थान नहीं होता। क्योंकि वे तो अपने भविष्य की कोई चिंता ही नहीं करते हैं, उनके लिए तो सब कुछ कृष्ण की इच्छा पर ही निर्भर होता है।

(श्रील प्रभुपाद,9 जनवरी 1975, देवमाया देवी दासी जी को पत्र)

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Bhagavad Gita Verse Of the Day:Chapter 6 Verse 43👇

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् |
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन || ४३ ||


तत्र – वहाँ; तम् – उस; बुद्धि-संयोगम् – चेतना की जागृति को; लभते – प्राप्त होता है; पौर्व-देहिकम् – पूर्व देह से; यतते – प्रयास करता है; च – भी; ततः – तत्पश्चात्; भूयः – पुनः; संसिद्धौ – सिद्धि के लिए; कुरुनन्दन – हे कुरुपुत्र |

Translation👇

हे कुरुनन्दन! ऐसा जन्म पाकर वह अपने पूर्वजन्म की दैवी चेतना को पुनः प्राप्त करता है और पूर्ण सफलता प्राप्त करने के उद्देश्य से वह आगे उन्नति करने का प्रयास करता है |

Commentary👇

राजा भरत, जिन्हें तीसरे जन्म में उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्म मिला, पूर्व दिव्यचेतना की पुनःप्राप्ति के लिए उत्तम जन्म के उदाहरणस्वरूप हैं | भरत विश्र्व भर के सम्राट थे और तभी से यह लोक देवताओं के बीच भारतवर्ष के नाम से विख्यात है | पहले यह इलावृतवर्ष के नाम से ज्ञात था | भरत ने अल्पायु में ही आध्यात्मिक सिद्धि के लिए संन्यास ग्रहण कर लिया था, किन्तु वे सफल नहीं हो सके | अगले जन्म में उन्हें उत्तम ब्राह्मण कुल में जन्म लेना पड़ा और वे जड़ भरत कहलाये क्योंकि वे एकान्त वास करते थे तथा किसी से बोलते न थे | बाद में राजा रहूगण ने इन्हें महानतम योगी के रूप में पाया | उनके जीवन से यह पता चलता है कि दिव्य प्रयास अथवा योगाभ्यास कभी व्यर्थ नहीं जाता | भगवत्कृपा से योगी को कृष्णभावनामृत में पूर्ण सिद्धि प्राप्त करने के बारम्बार सुयोग प्राप्त होते रहते हैं |

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