
मृत्यु के बाद आई पेंशन, जीवित रहते नहीं मिली—कर्ज में डूबी वृद्धा की मौत के बाद भी परिवार को नहीं मिला हक
उत्तराखंड में वृद्धा पेंशन व्यवस्था की जमीनी हकीकत एक बार फिर सवालों के घेरे में है। ग्राम उडमा (बस्तड़ी), जनपद पिथौरागढ़ की निवासी स्व. बसंती देवी का मामला प्रशासनिक संवेदनहीनता और व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है।
स्व. बसंती देवी वृद्धा अवस्था पेंशन योजना की लाभार्थी थीं। नियमानुसार उन्हें ₹1500 प्रतिमाह पेंशन मिलनी थी, लेकिन यह पेंशन नियमित मासिक रूप से न देकर पूरे वर्ष में एक साथ दी जाती रही। समय पर पेंशन न मिलने के कारण वृद्धा को अपने इलाज और दवाइयों के लिए कर्ज लेना पड़ा। लंबी बीमारी और आर्थिक तंगी से जूझते हुए 27 अप्रैल 2024 को उनकी मृत्यु हो गई।
चौंकाने वाला तथ्य यह है कि उनकी मृत्यु के लगभग दो माह बाद पेंशन की राशि उनके बैंक खाते में जमा हुई। जब नॉमिनी मनोज सिंह ने बैंक से यह राशि निकालने का प्रयास किया, तो विभाग और बैंक ने यह कहकर भुगतान से इनकार कर दिया कि “पेंशन मृत्यु के बाद आई है, इसलिए नॉमिनी को नहीं दी जा सकती।”
परिजनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह राशि स्व. बसंती देवी की मृत्यु-पूर्व अवधि की देय पेंशन थी, जो उन्हें जीवित रहते मिलनी चाहिए थी। विभागीय देरी के कारण भुगतान बाद में हुआ, लेकिन उसी देरी का खामियाजा अब परिवार को भुगतना पड़ रहा है।
मामले को और गंभीर बनाता यह तथ्य है कि नॉमिनी द्वारा पिछले एक वर्ष से अधिक समय से समाज कल्याण विभाग के कार्यालयों के चक्कर लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि समाज कल्याण अधिकारी दिलीप कुमार से लगातार संपर्क के बावजूद प्रकरण को लंबे समय तक उलझाकर रखा गया और कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह मामला केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि राज्य में वृद्धा पेंशन जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। यदि पेंशन समय पर मिलती, तो शायद वृद्धा को कर्ज लेकर इलाज न कराना पड़ता। अब उनकी मृत्यु के बाद भी परिवार कर्ज और प्रशासनिक उपेक्षा के बीच फंसा हुआ है।
पीड़ित परिवार और सामाजिक संगठनों ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग की है, ताकि न केवल इस परिवार को न्याय मिले, बल्कि भविष्य में किसी अन्य वृद्ध को ऐसी पीड़ा न झेलनी पड़े।
यह मामला प्रशासन से एक ही सवाल पूछता है—
क्या जनकल्याणकारी योजनाएं कागजों तक ही सीमित रह गई हैं?