
आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायपालिका की विरोधाभासी भूमिका: सामान्य वर्ग के भविष्य के साथ खुला अन्याय
आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायपालिका की विरोधाभासी भूमिका: सामान्य वर्ग के भविष्य के साथ खुला अन्याय
अब यह कहना अतिशयोक्ति नहीं रह गया है कि आरक्षण के प्रश्न पर देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था स्वयं विरोधाभास और भ्रम की स्थिति में फंसती दिखाई दे रही है। एक ओर देश के समग्र विकास में आरक्षण व्यवस्था को बाधक बताया जाता है, वहीं दूसरी ओर ऐसे फैसले सामने आ रहे हैं जिनसे आरक्षण का प्रतिशत लगातार बढ़ता जा रहा है। यह स्थिति किसी नीतिगत सूक्ष्मता का नहीं, बल्कि गंभीर और खतरनाक असंतुलन का संकेत है।
इन फैसलों की सबसे भारी कीमत सामान्य (जनरल) वर्ग के मेधावी छात्र चुका रहे हैं। योग्यता, मेहनत और प्रतिस्पर्धा के बावजूद उन्हें प्रवेश से वंचित किया जा रहा है। सीमित शैक्षणिक सीटें, तेजी से बढ़ती जनसंख्या और लगातार बढ़ता आरक्षण प्रतिशत, इन तीनों के बीच सामान्य वर्ग के छात्रों का भविष्य योजनाबद्ध तरीके से कुचला जा रहा है।
आरक्षण को सामाजिक न्याय का साधन नहीं, बल्कि खुलकर राजनीतिक हथियार बना दिया गया है। वोट बैंक की राजनीति के लिए देश की शिक्षा व्यवस्था की बलि दी जा रही है। विडंबना यह है कि इस प्रक्रिया में न तो वास्तव में वंचित वर्गों को स्थायी और प्रभावी न्याय मिल रहा है और न ही योग्य छात्रों को समान अवसर। यह दोहरा अन्याय नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता का स्पष्ट प्रमाण है।
सरकार की यह संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है कि देश की जनसंख्या, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और उच्च शिक्षा की बढ़ती मांग को देखते हुए हर वर्ष शैक्षणिक संस्थानों में सीटों की संख्या में ठोस, व्यावहारिक और प्रभावी वृद्धि की जाए। केवल आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाना किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि यह सामाजिक असंतोष को और गहरा करने वाला कदम है।
यदि सरकार और नीति निर्धारक इसी प्रकार आंखें मूंदे बैठे रहे, तो सामान्य वर्ग के छात्र सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे और आरक्षण विरोधी आंदोलन एक बार फिर देशभर में उभरेंगे। तब इसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार, तंत्र और निर्णय लेने वाली संस्थाओं की होगी। उस समय संयम और शांति की अपील करना केवल पाखंड और खोखला नैतिक उपदेश साबित होगा।
आज प्रश्न आरक्षण बनाम आरक्षण का नहीं है। आज प्रश्न न्याय, संतुलन और समान अवसर का है। और यदि न्याय किसी एक वर्ग तक सीमित रह जाए, तो उसे लोकतंत्र नहीं, बल्कि लोकतंत्र की खुली विफलता कहा जाएगा।