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न्याय का दोहरा मापदंड: क्या सामान्य वर्ग के लिए 'समानता' सिर्फ कागजी शब्द है?

✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा / भोपाल

नई दिल्ली/भोपाल: हाल के वर्षों में न्यायिक फैसलों और प्रशासनिक कार्रवाई के जो तरीके सामने आए हैं, उन्होंने भारत के सामान्य वर्ग (General Category) के भीतर एक गहरे असुरक्षा भाव को जन्म दिया है। जहाँ एक ओर सुप्रीम कोर्ट मेरिट में आगे रहने वाले आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को जनरल कैटेगरी में भी हक देने की बात करता है, वहीं दूसरी ओर सामान्य वर्ग का युवा खुद को सिमटते अवसरों के बीच पाता है।
1. संविधान की धारा 14 और 16 का चयनात्मक प्रयोग?
संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है और अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरियों में अवसर की समानता की बात करता है। लेकिन राजस्थान हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों के बाद यह सवाल उठ रहा है कि:
• यदि आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार बिना किसी रियायत के जनरल कट-ऑफ पार करता है, तो वह 'ओपन' श्रेणी में सीट लेगा।
• इसका परिणाम यह है कि जो सीटें 'अनारक्षित' थीं, उन पर भी आरक्षित वर्ग का कब्जा बढ़ रहा है, जिससे विशुद्ध रूप से सामान्य वर्ग के उम्मीदवार के लिए प्रतिस्पर्धा का दायरा और भी संकुचित हो गया है।
2. SC/ST एक्ट बनाम सामान्य न्याय की प्रक्रिया
अनिल मिश्रा जैसे मामलों में SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम की जिस तत्परता से व्याख्या की जाती है, वह सामान्य वर्ग के लिए चिंता का विषय है।
• इस कानून में अक्सर तत्काल गिरफ्तारी और जमानत में जटिलता होती है।
• सामान्य वर्ग का आरोप है कि जब उनकी आस्थाओं, देवी-देवताओं या महापुरुषों (जैसे सावरकर) का अपमान होता है, तो प्रशासन 'अभिव्यक्ति की आज़ादी' का हवाला देकर चुप्पी साध लेता है।
• यह 'कानूनी असंतुलन' समाज में न्याय के प्रति विश्वास को खत्म कर रहा है।
3. प्रशासनिक 'रसूख' और न्याय की विडंबना
ग्वालियर में सामने आई तस्वीर—जहाँ बलात्कार का आरोपी मकरंद बौद्ध, जो पुलिस रिकॉर्ड में 'फरार' है, वह DIG अमित सांघी को गुलदस्ता भेंट कर रहा है—यह बताती है कि कानून का क्रियान्वयन कितना पक्षपाती हो सकता है。
• जिस अपराधी को जेल में होना चाहिए, वह आला अधिकारियों के साथ फोटो खिंचवा रहा है।
• यह दृश्य उस सामान्य वर्ग के युवा को डराता है जो छोटी सी गलती पर भी 'कठोरतम' कानून का सामना करता है।
4. योग्यता (Merit) बनाम पहचान का संकट
तस्वीरें साफ दिखाती हैं कि एक 22 वर्षीय मेधावी संवर्ण युवा बेरोजगार है, जबकि उम्र और योग्यता की रियायतें पाकर अन्य वर्ग नियुक्तियां ले रहे हैं।
• क्या इंद्रा साहनी (1992) और आर.के. सभरवाल (1995) के फैसलों की व्याख्या अब केवल आरक्षण के पक्ष में ही होगी?
• क्या सामान्य वर्ग का टैक्स केवल उन योजनाओं के लिए है जहाँ उनके अपने बच्चों के लिए कोई स्थान नहीं है?
चेतावनी: बारूद के ढेर पर बैठा समाज
इतिहास गवाह है कि जब संवाद समाप्त होता है और समाज का एक बड़ा वर्ग (ब्राह्मण, बनिया, जैन, कायस्थ आदि) खुद को व्यवस्था से बहिष्कृत महसूस करने लगता है, तो वह स्थिति 'गृह युद्ध' या भारी अराजकता की ओर ले जाती है。 यदि न्याय 'सुविधा' और 'वोट बैंक' के आधार पर होता रहा, तो संवैधानिक लोकतंत्र का ढांचा ढहने में देर नहीं लगेगी I

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