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भ्रष्टाचार की जकड़ में व्यवस्था, आम जनता त्रस्त कब मिलेगा इंसाफ

रिपोर्ट : अरशद दीवान | जाले, दरभंगा

बिहार के उपमुख्यमंत्री श्री विजय सिंह साहब द्वारा हाल ही में सरकारी कर्मियों और अधिकारियों को रिश्वत न लेने की सख्त सलाह दी गई, जो अपने आप में सराहनीय है। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आती है। आज हालात यह हैं कि ऊपर से लेकर नीचे तक व्यवस्था में भ्रष्टाचार गहरे तक घर कर चुका है। ब्लॉक कार्यालय हो, थाना हो या कोई अन्य सरकारी दफ्तर—अधिकांश जगह बिना “चढ़ावे” के आम आदमी का काम होना लगभग असंभव हो गया है।

सबसे ज्यादा मार गरीब, मजदूर और आम नागरिक पर पड़ रही है। जिनके पास पैसा है, वे न सिर्फ नियमों को ताक पर रखकर अपना काम करवा लेते हैं, बल्कि कई बार आम जनता पर जुल्म भी करते हैं। जब कोई गरीब या लाचार व्यक्ति इसके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करता है और शिकायत दर्ज कराता है, तो अक्सर देखने में आता है कि पैसे और पहुंच के दम पर ऊपर से नीचे तक लोगों का मुंह बंद कर दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि शिकायत फाइलों में दबकर रह जाती है और दोषियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती।

आज यह समस्या सिर्फ किसी एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे देश में भ्रष्टाचार एक गंभीर चुनौती बन चुका है। रिश्वतखोरी इतनी बढ़ गई है कि ईमानदार व्यक्ति खुद को असहाय महसूस करने लगा है। सवाल यह है कि आम जनता आखिर जाए तो जाए कहां? अपनी फरियाद किससे कहे? जब थाने, प्रखंड कार्यालय, अंचल कार्यालय और अन्य विभागों में भी वही चेहरे बैठे हों, जो चंद पैसों में बिक जाते हों, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए?

जनता का कहना है कि अगर कोई गरीब मजदूर या साधारण नागरिक अपने हक के लिए आवाज उठाता है, तो उसे डराया-धमकाया जाता है या फिर उसकी शिकायत को नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसे में लोगों का भरोसा धीरे-धीरे शासन-प्रशासन से उठता जा रहा है, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।

इस गंभीर स्थिति को देखते हुए आम जनता की ओर से माननीय प्रधानमंत्री और माननीय मुख्यमंत्री से यह अपील की जा रही है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि सख्त और ईमानदार कार्रवाई हो। ऐसी ठोस व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें शिकायत करने वाले व्यक्ति की पहचान सुरक्षित रहे, उसकी बात सुनी जाए और दोषियों को बिना किसी दबाव के कड़ी सजा मिले।

अगर सच में सरकार भ्रष्टाचार मुक्त शासन की बात करती है, तो उसे ऊपर से लेकर नीचे तक जवाबदेही तय करनी होगी। तभी आम जनता को राहत मिलेगी, गरीब और मजदूर को इंसाफ मिलेगा और लोगों को यह भरोसा होगा कि देश में कानून और व्यवस्था सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं है।

आज जरूरत है कि सरकार इस आवाज को गंभीरता से सुने, क्योंकि यह सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि करोड़ों पीड़ित नागरिकों की पुकार है। अगर समय रहते इस पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो जनता का विश्वास टूटना तय है।
अब देखना यह है कि क्या यह आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंचेगी और क्या वास्तव में आम जनता को वह सुकून और न्याय मिल पाएगा, जिसकी उसे लंबे समय से तलाश है।

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