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एक फौजी की पेंशन : राष्ट्र की शांति पर चुकाई गई जवानी की कीमत


पेंशन नहीं, यह एक राष्ट्र द्वारा लिया गया उधार है
एक फौजी की पेंशन को वेतन समझना एक बुनियादी बौद्धिक भूल है। यह वह धन नहीं है जो उसने कमाया, यह वह कीमत है जो राष्ट्र ने उससे पहले ही वसूल ली। उसकी जवानी, उसका स्वास्थ्य, उसके पारिवारिक वर्ष, सब कुछ राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर अग्रिम में ले लिया गया। पेंशन उस उधार की आंशिक स्वीकृति है, पूर्ण भुगतान कभी संभव नहीं।
सुरक्षा का अदृश्य मूल्य ,जब आराम किसी और के हिस्से आता है
राष्ट्रीय सुरक्षा की भाषा अक्सर रणनीति, हथियार और बजट में सिमट जाती है। लेकिन इसकी वास्तविक कीमत इंसानी देह और मन में चुकाई जाती है। जब एक नागरिक चैन से सोता है, तब कोई जवान ऊँचाई, सीमा या जंगल में अपनी नींद राष्ट्र को सौंप देता है। उसका जीवन निरंतर अस्थिरता में ढला होता है, जहाँ हर आदेश अंतिम हो सकता है।
वर्दी के पीछे खड़ा परिवार : राष्ट्र का अनदेखा योगदान
हर फौजी के साथ एक परिवार भी सेवा में होता है बिना पद, बिना वेतन और बिना सार्वजनिक स्वीकारोक्ति के। माता-पिता अनिश्चित प्रतीक्षा में जीते हैं, जीवनसाथी अकेले निर्णय लेता है और बच्चे अनुपस्थिति को सामान्य मानकर बड़े होते हैं। यह त्याग किसी नीति दस्तावेज में दर्ज नहीं होता, लेकिन राष्ट्र की स्थिरता में इसकी भूमिका उतनी ही निर्णायक होती है।
सेवा के बाद भी समाप्त नहीं होती युद्ध की स्मृति
सेवा-निवृत्ति केवल औपचारिक होती है, युद्ध का अनुभव नहीं। कई फौजी टूटे शरीर, क्षत-विक्षत नसों और असहज स्मृतियों के साथ घर लौटते हैं। उनका जीवन दो हिस्सों में बंट जाता है, सेवा से पहले और सेवा के बाद। पेंशन उस जीवन-रेखा की तरह है, जो उन्हें गरिमा के साथ जीवित रहने का अवसर देती है।
पेंशन पर बहस , वित्तीय प्रश्न नहीं, नैतिक परीक्षा
जब पेंशन को ‘राजकोषीय बोझ’ कहा जाता है, तब दरअसल सवाल आर्थिक नहीं, नैतिक होता है। यह बहस यह तय करती है कि राष्ट्र अपने रक्षकों को लागत मानता है या मूल्य। एक लोकतंत्र में सैनिक का सम्मान केवल प्रतीकात्मक नहीं, संरचनात्मक होना चाहिए नीति, बजट और व्यवहार तीनों में।
नागरिक दायित्व : तिरंगे से आगे की जिम्मेदारी
नागरिकता केवल अधिकारों का संकलन नहीं, कर्तव्यों की स्वीकृति भी है। सैनिक की पेंशन पर संदेह करना आसान है, लेकिन उसकी जगह एक रात सीमा पर खड़े होने की कल्पना कठिन। आम नागरिक का धर्म है कि वह सैनिक और उसके परिवार को दया नहीं, समानता और सम्मान दे ,क्योंकि उन्होंने राष्ट्र को प्राथमिकता दी है, स्वयं को नहीं।
राष्ट्र की परख : स्मरण में या उपेक्षा में
किसी देश की आत्मा इस बात से प्रकट होती है कि वह अपने रक्षकों को सेवा के बाद कैसे देखता है। यदि फौजी को यह महसूस हो कि उसे अपने अधिकारों के लिए सफाई देनी पड़ रही है, तो यह केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं, राष्ट्रीय विफलता है। सुरक्षा केवल सीमा पर नहीं, संवेदना में भी सुनिश्चित की जाती है।
अंतिम निष्कर्ष ,कृतज्ञता एक नीति बने
एक फौजी की पेंशन उसकी सैलरी नहीं, उसकी जवानी की कीमत है। यह मूल्य किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विवेक से तय होना चाहिए। जो समाज अपने रक्षकों के त्याग को मोलभाव की भाषा में तौलने लगे, वह सुरक्षित भले दिखे पर भीतर से कमजोर होता है।

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