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आस्था का केंद्र, भय-चिंता से मुक्ति का द्वार: छितौली चौक पर परमहंस बाबा की समाधि

✍️ हरिदयाल तिवारी
गोरेयाकोठी से सिसई जाने वाले मार्ग पर स्थित छितौली चौक आज गहरी लोकआस्था और सामाजिक समरसता का केंद्र है। यहीं पर परमहंस बाबा का समाधि स्थल स्थित है, जबकि उनका जन्मस्थान सरारी गाँव माना जाता है। वर्षों से चली आ रही परंपराओं, स्मृतियों और कथाओं में यह तथ्य दृढ़ता से स्थापित है कि बाबा की आध्यात्मिक यात्रा सरारी से आरंभ होकर छितौली चौक पर समाधि के साथ पूर्ण हुई।
परमहंस बाबा का जीवन उस कालखंड से जुड़ा बताया जाता है जब समाज में जातीय रूढ़िवाद अपने चरम पर था। ऐसे समय में उन्होंने ऊँच-नीच, छोटे-बड़े के भेद को अस्वीकार करते हुए समता और करुणा को जीवन का मूल सिद्धांत बनाया। लोकमान्यता के अनुसार, बाबा मनुष्य ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों तक को ईश्वर का अंश मानते थे। यही कारण है कि उनके आश्रम और आसपास पशुओं के प्रति करुणा का भाव सहज रूप से दिखाई देता रहा।
सरारी गाँव के मिश्र परिवार से उनका संबंध बताया जाता है। पारिवारिक असहमति के कारण बाबा ने गृहस्थ जीवन का त्याग कर संन्यास का मार्ग अपनाया। कुछ समय तक वे अज्ञातवास में रहे, फिर वर्तमान छितौली चौक के निकट दिखाई दिए। यहीं उन्होंने साधना की और अंततः इसी स्थान पर समाधिस्थ हुए। समय के साथ यह स्थल केवल एक समाधि नहीं, बल्कि विश्वास, सेवा और लोकस्मृति का केंद्र बन गया।
बाबा से जुड़ी सबसे चर्चित लोककथा उस समय की है जब क्षेत्र में प्लेग जैसी महामारी का भय व्याप्त हुआ। कहा जाता है कि गाँव की रक्षा के लिए बाबा की माता स्वयं उनसे मिलने पहुँचीं। बाबा ने कहा कि यदि समय रहते सूचना दी गई होती, तो यह विपत्ति आती ही नहीं। इसके पश्चात उन्होंने अपने पास रहने वाले कुत्तों को आदेश दिया कि वे पूरे क्षेत्र की परिक्रमा कर गाँव को ‘किलित’ कर दें। लोकविश्वास है कि इस परिक्रमा के बाद सरारी और आसपास के क्षेत्र में प्लेग से कोई जनहानि नहीं हुई, जबकि पड़ोसी गाँवों में लोग महामारी से प्रभावित होते रहे। इस घटना ने बाबा की लोकछवि को और अधिक दृढ़ कर दिया।
आज छितौली चौक स्थित समाधि स्थल पर रोज़ाना सैकड़ों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं। शनिवार को यहाँ विशेष रूप से मेला लगता है, जिसमें दूर-दराज़ से भक्त आते हैं। मान्यता है कि बाबा के दर्शन से भय, चिंता और मानसिक अशांति से मुक्ति मिलती है। आसपास के गाँवों में यह परंपरा भी प्रचलित है कि बाबा के दर्शन किए बिना भोजन नहीं किया जाता—यह उनकी आस्था की गहराई को दर्शाता है।
समाधि स्थल का वातावरण सादगीपूर्ण, शांत और अनुशासित रहता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु मनोकामना, कृतज्ञता और सेवा—तीनों भावों के साथ उपस्थित होते हैं। परमहंस बाबा का संदेश आज भी प्रासंगिक है—समता, करुणा, निर्भयता और सामाजिक सौहार्द। यही कारण है कि बदलते समय में भी बाबा की मान्यता और प्रभाव जनजीवन में निरंतर बना हुआ है।
सूचना–स्रोत (आधार):
यह रिपोर्ट बाबा के परिवार से आने वाले शिक्षक श्री मनमोहन कुमार मिश्र एवं स्थानीय शिक्षक मुकुल कुमार सिंह से हुई बातचीत, साथ ही स्थानीय परंपराओं पर आधारित है। 🙏✨
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