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सोशल मीडिया ,वायरल सच और समाज की वास्तविकता

आज का युग सोशल मीडिया का युग है। लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, एक्स (ट्विटर) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ा हुआ है। इन माध्यमों पर धर्म, कर्म, संस्कृति, संस्कार और राजनीति से जुड़े असंख्य संदेश प्रतिदिन दिखाई देते हैं। लोग उन्हें पढ़ते हैं, बिना रुके फॉरवर्ड करते हैं और उस पर अपनी प्रतिक्रियाएँ भी देते हैं।
सामान्यतः कहा जाता है कि सोशल मीडिया का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है, किंतु हमारा अनुभव इसके उलट संकेत देता है। वास्तविकता यह है कि इन प्लेटफॉर्मों का मुख्य उद्देश्य समाचारों को वायरल करना है—सच को स्थापित करना नहीं। प्रायः वही समाचार तेजी से फैलते हैं, जिनकी सच्चाई संदिग्ध होती है या जिनका कोई प्रामाणिक आधार नहीं होता।
यही कारण है कि सोशल मीडिया पर झूठ सहजता से फैलता है, और दुर्भाग्यवश वही झूठ लोगों को अधिक प्रिय भी लगता है। लोग उन सूचनाओं को सत्य मान लेते हैं, उन पर पूर्ण विश्वास करते हैं और कभी यह आवश्यक नहीं समझते कि उन्हें किसी विश्वसनीय स्रोत से प्रमाणित किया जाए। क्योंकि वह समाचार उनके पूर्वाग्रह, भावनाओं या पसंद के अनुकूल होता है। इस स्थिति में झूठ फैलाने वाला और उससे प्रभावित होने वाला—दोनों एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं।
इसका दुष्परिणाम यह होता है कि एक सोची-समझी रणनीति के तहत समाज में असत्य को सत्य के रूप में स्थापित कर दिया जाता है। लोग बिना सोचे-समझे उस पर टिप्पणी करते हैं, उसे आगे बढ़ाते हैं और धीरे-धीरे वही झूठ सामाजिक स्वीकृति प्राप्त कर लेता है।
जहाँ तक धर्म, कर्म, संस्कृति और संस्कारों से जुड़े संदेशों का प्रश्न है, उनकी स्थिति और भी चिंताजनक है। ऐसे संदेश जैसे आते हैं, वैसे ही आगे बढ़ा दिए जाते हैं। वे व्यक्ति के जीवन, आचरण और व्यक्तित्व पर कोई वास्तविक प्रभाव नहीं डालते। वे केवल एक हाथ से दूसरे हाथ तक चलते रहते हैं। ठीक वैसे ही जैसे चिकने घड़े पर डाला गया पानी टिकता नहीं—संस्कारों की बातें भी मन, हृदय और आत्मा को स्पर्श किए बिना आगे बढ़ जाती हैं। न वे सोच बदलती हैं, न व्यवहार।
इसका सीधा अर्थ यह है कि सोशल मीडिया केवल वायरल होने का माध्यम बनकर रह गया है। जो सत्य है, जो सार्थक है, वह अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाता। परिणामस्वरूप सत्य निष्फल रह जाता है और माध्यम स्वयं प्रभावहीन हो जाता है।
यदि वास्तव में हम समाज में धर्म, कर्म, संस्कृति और संस्कारों का प्रचार-प्रसार करना चाहते हैं, तो उसका एकमात्र मार्ग यही है कि हम उन्हें पहले अपने जीवन में स्वीकार करें, अंगीकार करें और आचरण में उतारें। जब विचार व्यवहार बनते हैं, तभी उनका प्रभाव दूसरों पर पड़ता है।
राजनीतिक समाचारों का वायरल होना तो एक प्रकार का नशा बन चुका है। जब तक सोशल मीडिया रहेगा, यह नशा भी बना रहेगा। इस शोरगुल में समाज की अच्छी, सकारात्मक और रचनात्मक बातें दब जाती हैं, जबकि झूठ, उत्तेजना और नकारात्मकता से भरे संदेशों का बोलबाला बना रहता है।
यह स्थिति तब तक बनी रहेगी, जब तक समाज स्वयं जागरूक नहीं होगा—जब तक लोग यह नहीं समझेंगे कि हर वायरल चीज़ सत्य नहीं होती और हर सत्य चीज़ वायरल नहीं होती।

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