logo

सिर्फ नक्सलवाद का नहीं है, बल्कि न्याय, अधिकार और विकास की दिशा का है।



1️⃣ क्या बस्तर नक्सली-मुक्ति की ओर है?

हाँ, सुरक्षा के स्तर पर देखा जाए तो

नक्सली घटनाएँ कम हुई हैं

आत्मसमर्पण बढ़ा है

सड़कों, कैंपों और मोबाइल नेटवर्क का विस्तार हुआ है


लेकिन यह केवल सुरक्षा आधारित शांति है, सामाजिक शांति नहीं।

2️⃣ क्या बस्तर विकास की ओर है?

यहाँ सबसे बड़ा विरोधाभास है।

विकास दिखता है – पर किसके लिए?

खनिज → बाहर की कंपनियों के लिए

सड़क → सुरक्षा बलों और खनन के लिए

जंगल → उद्योग के लिए


जबकि

आदिवासी → विस्थापन

जमीन → अधिग्रहण

जंगल → छिनता हुआ जीवन


इसलिए सवाल उठता है:
👉 जिस विकास में मूल निवासी ही हाशिए पर चले जाएँ, क्या वह विकास है?

3️⃣ “नक्सलवाद हट रहा है, पर आदिवासी खाली कटोरे के साथ”

यह पंक्ति बहुत गहरी है।

बस्तर में:

लोहा, बॉक्साइट, टिन, सोना

पानी, जंगल, जैव विविधता


सब कुछ है, फिर भी

कुपोषण

बेरोज़गारी

शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली


नक्सलवाद सिर्फ बंदूक नहीं था, वह एक गुस्सा भी था —

> अधिकार छीने जाने का गुस्सा



अगर बंदूक हटे और अन्याय बना रहे,
तो शांति स्थायी नहीं होती।

4️⃣ आज का सच: नक्सलवाद से आगे की चुनौती

अब बस्तर के सामने सवाल यह नहीं है कि
❌ नक्सली रहें या न रहें

बल्कि सवाल है:
✔️ आदिवासी निर्णय में भागीदार होंगे या सिर्फ दर्शक?
✔️ खनिज पर पहला अधिकार किसका होगा?
✔️ ग्रामसभा कागज़ पर है या जमीन पर?

5️⃣ बस्तर अंधकार में है या रोशनी की ओर?

सच यह है:

बस्तर अंधकार से बाहर निकल रहा है

लेकिन रोशनी की दिशा तय नहीं हुई है


अगर यह रोशनी सिर्फ:

कंपनियों

ठेकेदारों

सत्ता के लिए होगी


तो बस्तर फिर किसी नए संघर्ष की ओर जाएगा।

निष्कर्ष

नक्सली-मुक्त बस्तर तभी सफल होगा,
जब वह आदिवासी-अधिकार युक्त बस्तर बने

2
123 views