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इंदौर जल मृत्यु कांड : धिक्कार है ऐसे 'नंबर वन' पर! इंदौर में यह मौत नहीं, 'सरकारी हत्या' है

"इंदौर में लोग पानी से नहीं, पानी की वजह से मरे।"
​इस एक पंक्ति को पढ़कर अगर प्रशासन को शर्म नहीं आती, तो मान लीजिए कि व्यवस्था मर चुकी है। इंदौर के भागीरथपुरा में जो हुआ, उसे 'हादसा' कहना उन मृतकों का अपमान है। यह हादसा नहीं, यह 'सिस्टम द्वारा किया गया सामूहिक हत्याकांड' है।
​सफाई का ढोंग और नलों में बहता जहर : सात बार देश का 'सबसे स्वच्छ शहर' होने का ढोल पीटने वाले इंदौर का असली चेहरा बेनकाब हुआ। जिस शहर की सड़कें चमक रही हैं, वहां के नागरिकों की आंतों में सीवेज का गंदा पानी उतारा जा रहा है। शर्म आनी चाहिए उन अधिकारियों और नेताओं को जो मंच पर चढ़कर 'इंदौर नंबर वन' के नारे लगवाते हैं। क्या यही है आपका नंबर वन शहर? जहाँ एक इंसान अपनी प्यास बुझाने के लिए नल खोलता है और बदले में उसे मौत मिलती है?
​स्मार्ट सिटी नहीं, यह 'कातिल व्यवस्था' है: जांच में क्या निकला? पानी की पाइपलाइन के ठीक ऊपर टॉयलेट बना दिया गया! यह किस इंजीनियर की डिग्री का कमाल है? यह कौन सी स्मार्ट सिटी की प्लानिंग है? यह घोर लापरवाही नहीं, यह आपराधिक कृत्य है। बिना सेप्टिक टैंक के शौचालय बनाना और उसे पीने के पानी की लाइन से सटा देना—यह सीधे तौर पर शहर की जनता को जहर पिलाने की साजिश थी, जिसे प्रशासन ने अपनी नाक के नीचे पनपने दिया।
​शिकायतों को रद्दी समझने का अंजाम: लोग चिल्लाते रहे, शिकायतें करते रहे कि पानी गंदा आ रहा है, बदबू आ रही है। लेकिन प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। क्यों? क्योंकि वे तो 'स्वच्छता सर्वेक्षण' के लिए फोटो खिंचवाने और दीवारों पर पेंटिंग करवाने में व्यस्त थे। जब तक लाशें नहीं बिछीं, तब तक सरकारी तंत्र की नींद नहीं टूटी। आज जो लोग अस्पताल में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं, उनका गुनहगार कौन है? सिर्फ सस्पेंड किए गए छोटे कर्मचारी या वो बड़े अफसर जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर शहर को 'वर्ल्ड क्लास' बताते हैं?
​तमगे वापस कर दो, अगर साफ पानी नहीं दे सकते : बंद करिए यह स्वच्छता का नाटक। अगर आप अपने नागरिकों को साफ पानी जैसा बुनियादी अधिकार नहीं दे सकते, तो उन तमाम अवॉर्ड्स और ट्राफियों को कचरे के डब्बे में डाल दीजिये—उसी कचरे में, जिसे अलग करवाने का आप दंभ भरते हैं।
​जनता टैक्स इसलिए नहीं भरती कि उसे बदले में सीवर का पानी पीने को मिले। मुआवजे के चंद टुकड़े देकर आप किसी के घर का चिराग वापस नहीं ला सकते। यह वक्त जांच समितियों का नहीं, बल्कि हथकड़ियों का है। उन सभी को जेल में डालना चाहिए जिनकी अनदेखी ने हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया।
​याद रखिये, इंदौर की जनता ने आपको सिर आंखों पर बिठाया था, लेकिन अगर आप उन्हें पानी के नाम पर जहर पिलाएंगे, तो यह जनता आपको अर्श से फर्श पर लाने में देर नहीं लगाएगी।
​शर्म करो प्रशासन, शर्म करो!

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